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Showing posts from March, 2010

सुख-दुःख की पहचान जरुरी है

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रामचरितमानस में जब गरुण ने काकभुसुंडी जी से पूछा कि संसार का सबसे बड़ा सुख और सबसे बड़ा दुख क्या है तो इस सवाल का जवाब गोस्वामी जी ने कुछ इस प्रकार कहलवाया- नहिं दरिद्र सम दुःख जग माही। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥ यानी दरिद्रता के समान संसार में कोई दुःख नहीं है जबकि संत के मिलन के समान संसार में कोई सुख नहीं। वैसे दरिद्रता का उल्टा तो सम्पन्नता होता है। जब दरिद्रता सबसे बड़ा दुःख है तो सम्पन्नता सबसे बड़ा सुख होना चाहिए। लेकिन गोस्वामी जी ने सम्पन्नता में सुख नहीं बताया। उन्होंने सुख बताया संतों के दर्शन में। और संत का मतलब भी केवल भगवाधारियों से नहीं है, अर्थ है व्यक्ति के स्वभाव से। संत स्वभाव वाले लोगों का संग करने के समान संसार में सुख नहीं। गोस्वामी जी ने एक ही चौपाई में पूरी बात समझा रखी है। लेकिन दुनिया समझने को तैयार नहीं। ऊपर से लेकर नीचे तक सब पैसे की दौड़ में शामिल हैं। पूरा ध्यान इसी तरफ है कि अधिक से अधिक पैसा किस तरह कमाया जाये। चलिए कमाने में कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन ये क्या कि पैसे कमाने के चक्कर में दूध की जगह यूरिया बेचा जा रहा है, धनिये की जगह घोड़े की लीद, मावे की...

नाम पर नहीं अपने काम पर ध्यान दें

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राम काज करिबे को आतुर, हनुमान जी को राम काज कि इतनी लगन थी कि उन्होंने कभी अपना ध्यान ही नहीं किया। उनको न नाम की चिंता थी, न आराम की, न किसी मान और सम्मान की चाह। उनके लिए तो बस राम जी का काज होना जरुरी था। जब भगवन राम का संधि प्रस्ताव लेकर अंगद को रावण के पास जाना पड़ा तब रावण ने अंगद से कहा कि राम की सेना में एक भी ऐसा बलशाली नहीं जो मेरा मुकाबला कर सके। राम खुद पत्नी के वियोग में दुखी है, जामवंत बूढा है, विभीषण तो स्वाभाव से कायर है, सुग्रीव कितना वीर है सब जानते हैं, इनमें से कोई मेरे सामने नहीं ठहरता। लेकिन हाँ एक बन्दर है जो थोडा बलशाली है, जिसने लंका को आग लगे थी। बाकी सब तो बेकार हैं। इस पर अंगद ने रावण के दरबार में अपना पांव जमाकर अपने और राम के बल का एहसास रावण को करा दिया था। इसके बाद जब अंगद वापस अपने शिविर में आये तो उन्होंने हनुमान जी से यही पुछा कि तुमने पूरी लंका को जला दिया, रावण के मद को चूर कर दिया और वहां अपना नाम तक बता कर नहीं आये। रावण तुम्हारा नाम तक नहीं जानता। इस पर हनुमान जी का जवाब था कि मैं वहां अपना नाम करने गया था या राम जी का काम करने गया था। हनुमान जी ...