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“जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू…” — जब चाहत संकल्प बन जाती है

जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू।  सो तेहि मिलई न कछु संदेहू॥ गोस्वामी तुलसीदास जी की श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई देखने में जितनी सरल है, अर्थ में उतनी ही गहरी। इसका सामान्य अर्थ है— जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे निश्चय ही प्राप्त करता है; इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन ‘सत्य सनेहू’ केवल प्रेम या भावनात्मक लगाव नहीं है। यही इस चौपाई की सबसे गहरी बात है। यहाँ ‘सत्य सनेह’ को यदि व्यापक अर्थ में देखें, तो यह उस सच्ची, निष्ठापूर्ण और पूर्ण समर्पित चाहत का प्रतीक है, जिसमें मनुष्य किसी लक्ष्य को केवल चाहता नहीं, बल्कि उसके लिए स्वयं को पूरी तरह लगा देता है। हम अक्सर जीवन में चाहते बहुत कुछ हैं—लेकिन क्या हम उसे पूरी सच्चाई से चाहते हैं? यही प्रश्न इस चौपाई को आज के जीवन के लिए अत्यंत प्रासंगिक बना देता है। चाहत और सच्ची चाहत में अंतर हम कहते हैं— “मुझे यह नौकरी चाहिए।” “मुझे आगे बढ़ना है।” “मुझे स्वस्थ होना है।” “मुझे अपना व्यवसाय बढ़ाना है।” “मुझे परीक्षा में सफल होना है।” “मुझे अपने रिश्ते को बेहतर बनाना है।” लेकिन केवल इच्छा कर लेना पर्याप्त नहीं है। हम चाहते हैं...

सुमति और कुमति: जीवन की दिशा तय करने वाली शक्ति

“जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥” गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई जीवन के एक अत्यंत गहरे सत्य को बहुत सरल शब्दों में व्यक्त करती है। इसका अर्थ है— जहाँ अच्छी बुद्धि, विवेक और सद्विचार होते हैं, वहाँ अनेक प्रकार की संपत्ति आती है; और जहाँ दुर्बुद्धि, अविवेक तथा गलत विचार होते हैं, वहाँ विपत्ति का मूल उत्पन्न होता है। यहाँ ‘सुमति’ और ‘कुमति’ केवल अच्छी और बुरी सोच के सामान्य अर्थों तक सीमित नहीं हैं। ये मनुष्य के विचार, विवेक, निर्णय, दृष्टिकोण और आचरण की दिशा को दर्शाते हैं। परिस्थितियाँ हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं, लेकिन उन परिस्थितियों में हम क्या सोचते हैं और कैसे निर्णय लेते हैं, वही आगे की दिशा तय करता है। सुमति क्या है? सुमति का अर्थ है—सद्बुद्धि, विवेकपूर्ण विचार, सही-गलत की पहचान, दूरदर्शिता और कल्याणकारी निर्णय लेने की क्षमता। सुमति वाला व्यक्ति केवल यह नहीं सोचता कि “मुझे अभी क्या मिलेगा?” बल्कि यह भी विचार करता है कि “मेरे निर्णय का आगे क्या परिणाम होगा और इसका प्रभाव मुझ पर तथा दूसरों पर क्या पड़ेगा?” सुमति में वि...

सच बोलने वाले सलाहकार ही बचाते हैं राज्य, शरीर और धर्म

  सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥ भावार्थः सचिव, वैद्य और गुरु—ये तीन यदि (अप्रसन्नता के) भय या (लाभ की) आशा से हित की बात न कहकर केवल प्रिय वचन बोलने लगें, तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म—इन तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है। आज बात श्रीरामचरितमानस के एक अत्यंत महत्वपूर्ण दोहे की। गोस्वामी तुलसीदास जी  द्वारा रचित मानस के सुंदरकाण्ड में आया यह दोहा हमें एक गहरी प्रशासनिक, नैतिक और जीवन प्रबंधन की शिक्षा देता है। यह शिक्षा केवल शासन-प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक और पेशेवर जीवन —तीनों के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह दोहा हमें तीन महत्वपूर्ण व्यक्तियों के बारे में सावधान करता है— सचिव (सलाहकार), वैद्य (डॉक्टर) और गुरु (मार्गदर्शक) । तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि ये तीनों व्यक्ति भय या स्वार्थ के कारण सच्ची और हितकारी बात कहने से बचने लगें और केवल ठकुरसुहाती यानी सुनने में अच्छी लगने वाली बातें ही कहने लगें, तो इसके परिणाम अत्यंत घातक हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में राज्य का पतन, शरीर का रोग और धर्म का क्षय —ये त...

इस चौपाई में छिपी है सेवा और सुशासन की सीख

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥ भावार्थः जिसके राज्य में प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है॥ गोस्वामी तुलसीदासी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई अत्यंत प्रसिद्ध है। इसका संदेश जितना सरल और स्पष्ट है, उतना ही गहरा और व्यापक भी है। बालकाण्ड के प्रसंग में भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी को यह समझाते हुए सीख देते हैं कि जिस शासक के शासन में सामान्य जनता दुखी रहती है, वह शासक वास्तव में अपने पद के धर्म का पालन नहीं कर रहा होता और अंततः वह दंड का भागी बनता है। यह चौपाई शासन की मूल भावना को अत्यंत संक्षेप में व्यक्त करती है- सत्ता का उद्देश्य सामान्य जन का सुख और कल्याण है। पद का आकर्षण और उसका वास्तविक उद्देश्य आज के समय में सत्ता के शीर्ष पदों को उनकी शक्ति, प्रतिष्ठा और सुविधाओं के कारण अत्यंत आकर्षक माना जाता है। जब भी कोई व्यक्ति ऐसे पद प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त करता है, तो अक्सर उसके पीछे कहीं न कहीं उस पद से जुड़ी शक्ति और सुविधाओं का आकर्षण भी छिपा होता है। जबकि सच्चाई यह है कि पद चाहे छोटा हो या बड़ा, उसका मूल उद्...

आर्थिक प्रबंधन की सीख देती है मानस की यह चौपाई

सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥ भावार्थ:  वह धन धन्य है, जिसकी पहली गति होती है (जो दान देने में व्यय होता है) वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में लगी हुई है।  गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई हमें आर्थिक प्रबंधन और सकारात्मक जीवन-दृष्टि की महत्वपूर्ण सीख देती है। उत्तरकाण्ड में वर्णित यह चौपाई बताती है कि धन का सर्वोत्तम उपयोग क्या है और उसे किस प्रकार जीवन में सार्थक बनाया जा सकता है। भारतीय चिंतन में धन की तीन गतियाँ बताई गई हैं— दान, भोग और नाश । इनमें दान को सर्वोत्तम, भोग को मध्यम और नाश को निकृष्ट माना गया है। जो व्यक्ति न तो धन का दान करता है और न ही उसका उचित उपभोग करता है, उसके धन की अंततः तीसरी गति अर्थात् नाश ही होती है। हम अक्सर सुनते हैं कि अत्यधिक संचय से बचना चाहिए। जितना आवश्यक हो उतना ही संचय करना उचित है। संचित धन का मूल्य समय के साथ धीरे-धीरे कम होता चला जाता है। इसी कारण आज अधिकांश लोग केवल धन को जमा करने की बजाय निवेश को प्राथमिकता देते हैं। बैंक की ब्याज दरें भी अब इतनी अधिक नहीं रहीं कि केवल बै...

बेहद कठिन होता है पद के मद से बच पाना

नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥ भावार्थः इस संसार में ऐसा कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ है, जिसे प्रभुता-अर्थात् शक्ति, पद या अधिकार-पाकर मद (अहंकार) न हुआ हो। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई जीवन की एक अत्यन्त यथार्थपूर्ण और कठोर सच्चाई को हमारे सामने रखती है। तुलसीदास जी यहाँ किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि मनुष्य-स्वभाव की बात कर रहे हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि प्रभुता मिलने पर मद का आना लगभग अनिवार्य है-इससे पूर्णतः बच पाना अत्यन्त कठिन है। यहाँ मद का अर्थ केवल घमंड नहीं, बल्कि वह नशा है जो पद, शक्ति, धन, सौंदर्य, यौवन, बल या अधिकार से उत्पन्न होता है। जब व्यक्ति को यह अनुभव होने लगता है कि वह दूसरों से ऊपर है, उसके एक निर्णय से लोगों का जीवन प्रभावित होता है, तब अनजाने ही उसके भीतर ‘मैं’ का भाव गहराने लगता है। इस चौपाई का संदर्भ उस प्रसंग से जुड़ा है, जब दक्ष प्रजापति अपने पद के मद में भगवान शिव की अवहेलना कर बैठते हैं। शिव जैसे महादेव को भी अपमानित करने का साहस पद के मद से ही उत्पन्न होता है। इस प्रसंग के माध्यम से तुलसीदास जी यह स्थ...

कुशल कार्य प्रबंधन सिखाती मानस की यह चौपाई

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा॥ अर्थ:  मुनीश्वर वशिष्ठ जी ने जिस व्यक्ति को जो कार्य करने की आज्ञा दी, उसने उस कार्य को इतनी तत्परता और दक्षता से पूर्ण किया, मानो वह कार्य पहले से ही करके रखा हो। यह चौपाई श्रीरामचरितमानस के उस आदर्श कार्य-संस्कृति को उजागर करती है, जहाँ उद्देश्य स्पष्ट है, नेतृत्व सक्षम है और कार्य-वितरण सुव्यवस्थित है। भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी कोई साधारण आयोजन नहीं थी—वह सामाजिक, राजनैतिक और आध्यात्मिक तीनों स्तरों पर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समारोह था। इस विराट दायित्व का कुशल संचालन महर्षि वशिष्ठ के मार्गदर्शन में हुआ और प्रत्येक व्यक्ति ने अपने-अपने उत्तरदायित्व को पूर्ण निष्ठा, अनुशासन और गति के साथ निभाया। यह चौपाई आधुनिक कार्य-प्रबंधन (Work Management) के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है। कोई भी कार्य तभी तीव्रता और गुणवत्ता के साथ सम्पन्न होता है, जब उसके लिए पूर्व-तैयारी की गई हो। जिस व्यक्ति को अपने दायित्व का स्पष्ट ज्ञान होता है और जिसने मानसिक तथा व्यावहारिक तैयारी पहले से कर रखी होती है, वह आदेश मिलते ही अव्यवस्था म...