Wednesday, February 11, 2026

मर्यादा का सूत्र: कहाँ जाना चाहिए और कहाँ नहीं

 

जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥

(यद्यपि इसमें संदेह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए भी जाना चाहिए, तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जाने से कल्याण नहीं होता।)

श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में आई यह चौपाई सामाजिक मर्यादा, आत्मसम्मान और विवेक का अत्यन्त सूक्ष्म सूत्र प्रस्तुत करती है। गोस्वामी तुलसीदास जी यहाँ केवल व्यवहार की बात नहीं करते, बल्कि जीवन की एक ऐसी परिस्थिति का समाधान देते हैं, जिससे लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी अवश्य गुजरता है।

इस चौपाई का प्रसंग भगवान शिव और माता सती से जुड़ा है। सती जी अपने पिता प्रजापति दक्ष के यहाँ आयोजित यज्ञ में जाना चाहती हैं, परन्तु शिव जी से वैर रखने के कारण दक्ष ने अपनी पुत्री को आमंत्रित नहीं किया था। तब भगवान शिव सती जी को समझाते हैं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए जाना अनुचित नहीं माना जाता, क्योंकि वहाँ अधिकार और आत्मीयता का संबंध होता है। किन्तु वे यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि जहाँ विरोध, उपेक्षा या तिरस्कार की भावना हो, वहाँ जाना कल्याणकारी नहीं होता—चाहे वह स्थान कितना ही निकट या अपना क्यों न हो।

आगे की कथा सर्वविदित है। सती जी के आग्रह पर शिव जी उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति तो दे देते हैं, पर वहाँ उन्हें अपमान सहना पड़ता है। जब वे भगवान शिव का अपमान देखती हैं, तो उसे सहन नहीं कर पातीं और योगाग्नि में स्वयं को भस्म कर लेती हैं। यह प्रसंग केवल कथा नहीं, बल्कि विवेक की उपेक्षा का गम्भीर परिणाम है।

यह शिक्षा आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। आधुनिक जीवन में रिश्ते, कार्यस्थल, सामाजिक समारोह और पारिवारिक कार्यक्रम—इन सब में अक्सर यह दुविधा उत्पन्न होती है कि बिना आमंत्रण के जाना चाहिए या नहीं। कई बार मन करता है, पर मन के भीतर एक असहजता भी रहती है।

मानस हमें यहाँ भावनाओं के स्थान पर विवेक को प्राथमिकता देने की सीख देता है। जहाँ हमें केवल सहन किया जा रहा हो, जहाँ उपस्थिति से प्रसन्नता नहीं बल्कि असहजता पैदा हो, वहाँ जाना स्वयं के आत्मसम्मान और मानसिक शांति दोनों के लिए हानिकारक हो सकता है।

आज के युग में यह बात केवल पारिवारिक या सामाजिक संदर्भ तक सीमित नहीं है। कार्यस्थल पर, मित्रता में, यहाँ तक कि ऑनलाइन और सोशल स्पेस में भी यह सूत्र लागू होता है। जहाँ आपकी उपस्थिति का स्वागत न हो, वहाँ बार-बार जाने से न तो संबंध सुधरते हैं और न ही आत्मसम्मान बचता है।

इस चौपाई का सार यह नहीं है कि संबंध तोड़ दिए जाएँ, बल्कि यह है कि हर संबंध में मर्यादा और संतुलन बनाए रखा जाए। प्रेम, अपनत्व और अधिकार वहीं तक शोभा देते हैं, जहाँ उन्हें स्वीकार किया जाए।

शिव जी का यह उपदेश हमें सिखाता है—

  • जहाँ सम्मान न हो, वहाँ आग्रह न करें

  • जहाँ विरोध हो, वहाँ विवेक से दूरी रखें

  • और जहाँ स्वागत हो, वहीं संबंधों को पोषित करें

क्या हम अंदर से भी उतने सुंदर हैं, जितने बाहर से दिखते हैं?

 

मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसें॥

(यह मन का मैला और शरीर का कैसा सुंदर है, जैसे विष के रस से भरा हुआ सोने का घड़ा!)


श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में आई यह चौपाई केवल नैतिक उपदेश नहीं है, बल्कि मनुष्य के व्यक्तित्व को परखने की एक अत्यन्त सूक्ष्म कसौटी है। जिसका मन मैला हो, उसका शरीर कितना ही सुंदर क्यों न हो, वह किस काम का? वह तो उसी प्रकार है जैसे विष से भरा हुआ सोने का घड़ा—बाहर से अत्यन्त आकर्षक, भीतर से घातक।

आज के समय में यह चौपाई और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। आधुनिक समाज में व्यक्तित्व का मूल्यांकन अधिकतर बाहरी आडम्बरों से किया जाता है—सुंदर चेहरा, प्रभावशाली भाषा, ऊँचा पद, प्रसिद्धि और सोशल मीडिया पर बनाई गई छवि। परन्तु इन सबके पीछे मन की वास्तविक स्थिति क्या है, इसका अनुमान लगाना अत्यन्त कठिन हो गया है।

अनेक बार हम देखते हैं कि बाहर से अत्यन्त शालीन, सभ्य और सफल दिखने वाले लोग भीतर से ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और स्वार्थ से भरे होते हैं। बातचीत में भी आपने लोगों को कहते सुना होगा—“दिखने पर मत जाना, मन का बहुत काला है।” यह अनुभव जीवन में लगभग हर व्यक्ति ने कभी न कभी किया है।

कई बार बड़ी-बड़ी हस्तियाँ—सेलिब्रिटी, खिलाड़ी, नेता या समाज के आदर्श माने जाने वाले लोग—हमारे लिए प्रेरणा बन जाते हैं। पर जब उनके निजी जीवन की सच्चाइयाँ सामने आती हैं, तो मन टूट जाता है। तब समझ में आता है कि बाहरी चमक और आन्तरिक शुद्धता में कितना बड़ा अंतर हो सकता है।

तुलसीदास जी इस चौपाई के माध्यम से हमें चेतावनी ही नहीं, बल्कि दिशा भी देते हैं। वे कहते हैं कि जीवन को सुंदर बनाने के लिए केवल तन की नहीं, मन की साधना आवश्यक है। क्योंकि मन ही कर्मों का स्रोत है। यदि मन शुद्ध होगा, तो विचार शुद्ध होंगे; विचार शुद्ध होंगे, तो आचरण स्वतः ही सुंदर हो जाएगा।

सच्ची सुंदरता वह नहीं है जो आँखों को भाए, बल्कि वह है जो मन को शान्ति दे। सच्चा व्यक्तित्व वह नहीं जो मंच पर चमके, बल्कि वह है जो एकान्त में भी सच्चा बना रहे।

यह चौपाई हमें आत्मचिन्तन के लिए प्रेरित करती है—

  • क्या हमारी बाहरी सफलता के पीछे मन की पवित्रता भी है?

  • क्या हम जैसे दिखते हैं, वैसे ही भीतर से भी हैं?

  • कहीं हमारा व्यक्तित्व सोने के घड़े जैसा तो नहीं, जिसमें विष भरा हो?

यदि जीवन को वास्तव में श्रेष्ठ बनाना है, तो सबसे पहले मन को स्वच्छ बनाना होगा। क्योंकि सुंदर तन समय के साथ ढल जाता है, पर शुद्ध मन जीवन को अमर बना देता है।

स्थायी आय ही सच्चा आर्थिक प्रबंधन है

 

सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥

(जिन नदियों के मूल में कोई जलस्रोत नहीं है। (अर्थात जिन्हें केवल बरसात ही आसरा है) वे वर्षा बीत जाने पर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं॥)

श्रीरामचरितमानस के सुंदरकाण्ड में आई यह चौपाई पहली दृष्टि में प्रकृति का वर्णन प्रतीत होती है, पर वास्तव में यह आर्थिक प्रबंधन का एक अत्यन्त व्यावहारिक और कालजयी सूत्र देती है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जिन नदियों के मूल में कोई स्थायी जलस्रोत नहीं होता—जो केवल वर्षा पर निर्भर रहती हैं—वे बरसात समाप्त होते ही पुनः सूख जाती हैं।

यह बात केवल नदियों तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य के आर्थिक जीवन पर भी पूरी तरह लागू होती है। जिस व्यक्ति या परिवार के पास आय का स्थायी स्रोत नहीं होता, वह थोड़े समय की सम्पन्नता के बाद पुनः आर्थिक संकट में फँस जाता है।

आज के समय में आर्थिक चुनौतियाँ केवल आय की कमी से नहीं, बल्कि गलत वित्तीय आदतों से अधिक उत्पन्न हो रही हैं। अनेक लोग अपनी वास्तविक आय से अधिक खर्च करने लगते हैं। कभी किसी सम्पन्न रिश्तेदार पर निर्भर हो जाते हैं, कभी माता-पिता की बचत को आधार बना लेते हैं। कुछ लोग अस्थायी सुविधाओं के भरोसे जीवन-शैली खड़ी कर लेते हैं—जैसे बोनस, विरासत, एकमुश्त लाभ या बाहरी सहायता।

समस्या तब गम्भीर हो जाती है जब इच्छाओं की पूर्ति के लिए बैंक ऋण, पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड का अत्यधिक उपयोग होने लगता है। बिना यह सोचे कि यह धन स्थायी नहीं है, और एक दिन इसकी वापसी करनी ही होगी। जब वह “वर्षा” रुकती है, तब जीवन-रूपी नदी अचानक सूखने लगती है—तनाव, असुरक्षा और ऋण के बोझ के साथ।

मानस की यह चौपाई हमें स्पष्ट संकेत देती है कि आर्थिक स्थिरता का आधार अस्थायी आय नहीं, बल्कि सतत आय स्रोत होते हैं। जैसे नदी का जीवन उसके मूल स्रोत—झरने, हिमनद या भूमिगत जल—पर निर्भर करता है, वैसे ही व्यक्ति का आर्थिक जीवन उसके नियमित, भरोसेमंद और दीर्घकालिक आय-स्रोत पर टिका होता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि ऋण लेना या सहायता स्वीकार करना गलत है। समस्या तब होती है जब पूरा जीवन-प्रबंधन ही इन्हीं पर आधारित हो जाए। ऋण सहारा हो सकता है, आधार नहीं। बाहरी सहायता पुल हो सकती है, स्थायी भूमि नहीं।

सही आर्थिक प्रबंधन का मूल मंत्र है—

  • अपनी आय के भीतर रहकर खर्च करना

  • नियमित बचत की आदत डालना

  • आय के एक से अधिक स्थायी स्रोत विकसित करना

  • और भविष्य की अनिश्चितताओं के लिए तैयारी रखना

गोस्वामी तुलसीदास जी की यह चौपाई हमें यह भी सिखाती है कि आर्थिक समझ केवल गणित नहीं, विवेक का विषय है। जो व्यक्ति आज की चमक में बहकर कल की तैयारी नहीं करता, वह वर्षा के बाद सूखी नदी की तरह रह जाता है।

सफलता का भार वही उठा पाता है, जिसकी मर्यादा गहरी हो

छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥

छोटी नदियाँ भरकर (किनारों को) तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं (मर्यादा का त्याग कर देते हैं)।

श्रीरामचरितमानस के किष्किन्धा काण्ड में वर्षा ऋतु के वर्णन के प्रसंग में आई यह चौपाई केवल प्रकृति का चित्रण नहीं है, बल्कि मानव स्वभाव का अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि वर्षा के समय छोटी-छोटी नदियाँ जल से भरकर अपने ही किनारों को तोड़ती हुई बहने लगती हैं - ठीक उसी प्रकार जैसे थोड़े से धन या सफलता के मिलते ही दुष्ट प्रवृत्ति के लोग मर्यादा का त्याग कर बैठते हैं।

यह तुलना बहुत गहरी है। नदी छोटी हो या बड़ीकृपानी तो सबमें आता है। परन्तु फर्क यह है कि बड़ी और गहरी नदियाँ जल को अपने भीतर समेट लेती हैं, जबकि उथली नदियाँ उफनकर विनाश का कारण बन जाती हैं। यही स्थिति मनुष्य के जीवन में भी दिखाई देती है। सफलता, धन, पद या यश- ये सब “वर्षा” के समान हैं। पर यह वर्षा किसे समृद्ध करेगी और किसे विनाश की ओर ले जाएगी, यह व्यक्ति की आन्तरिक गहराई पर निर्भर करता है।

यह चौपाई हमें संकेत देती है कि सफलता को सँभाल पाना हर किसी के वश की बात नहीं होती। कई बार हम छोटी-छोटी उपलब्धियों से ही इतना फूल जाते हैं कि जीवन की दिशा ही भटक जाती है। व्यवहार में अकड़ आ जाती है, वाणी में कटुता आ जाती है और निर्णयों में विवेक का स्थान अहंकार ले लेता है। कुछ लोगों में व्यसन, विलास और भोग की प्रवृत्तियाँ भी इसी अवस्था में जन्म लेती हैं।

सबसे खतरनाक स्थिति तब आती है, जब ईश्वर की कृपा, परिस्थितियों का सहयोग और समाज का योगदानकृइन सबको भूलकर व्यक्ति अपनी सफलता को केवल अपना पुरुषार्थ मानने लगता है। यहीं से अहंकार जन्म लेता है। और अहंकार वही उफनती नदी है, जो सबसे पहले अपने ही तटों को तोड़ती है - अर्थात् अपने ही चरित्र, सम्बन्धों और मर्यादा को।

भारतीय दृष्टि में सफलता का मूल्यांकन उसके विस्तार से नहीं, उसके संयम से होता है। जो व्यक्ति जितना बड़ा होता है, उतना ही अधिक विनम्र होता है - यही सच्ची परिपक्वता है। गहराई का लक्षण शोर नहीं, स्थिरता है।

इस चौपाई से जीवन का एक स्पष्ट सूत्र निकलता है -

सफलता मिले तो स्वयं को बड़ा न समझो, अपने भीतर की मर्यादा को और गहरा करो।

क्योंकि जो व्यक्ति अपने अहंकार को नहीं बाँध पाता, वह अपनी ही सफलता का शिकार बन जाता है।

Wednesday, January 28, 2026

अपने मुख से अपना गुणगान करने से क्षीण होते हैं पुण्य

 

छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती।

निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥

श्रीरामचरितमानस के लंका काण्ड में आई यह चौपाई केवल युद्ध-वर्णन नहीं है, बल्कि मानव जीवन के लिए एक अत्यन्त सूक्ष्म और गहन संकेत है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि युद्ध के दौरान राक्षसों की सेना दिन-रात उसी प्रकार घटती जा रही है, जैसे अपने ही मुख से कहने पर पुण्य क्षीण हो जाते हैं।

यह उपमा साधारण नहीं है। इसके भीतर जीवन का एक गूढ़ सत्य छिपा है। सामान्यतः हम मानते हैं कि सत्कर्म करने से पुण्य बढ़ते हैं, परन्तु तुलसीदास जी यहाँ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि सत्कर्म का प्रदर्शन, उसका प्रचार और आत्म-प्रशंसा—पुण्य को नष्ट कर देती है।

आज का समय आत्मप्रचार का समय बन गया है। कोई छोटा सा भी अच्छा कार्य हो—दान दिया, किसी की सहायता की, कार्यालय में सफलता मिली या कोई सामाजिक कार्य किया—तो तुरंत उसका प्रदर्शन आरम्भ हो जाता है। विशेष रूप से सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र कर दिया है। एक गरीब को भोजन कराया, तो उसके साथ ली गई तस्वीरें प्रमाण बन जाती हैं; मानो सहायता से अधिक उसका दिखाया जाना आवश्यक हो।

परन्तु मानस हमें सावधान करती है। सत्कर्म की शक्ति उसकी निःशब्दता में होती है। जो पुण्य ढिंढोरे के साथ किया जाए, वह भीतर से खोखला हो जाता है। पुराने बुजुर्ग भी कहा करते थे—दान ऐसा होना चाहिए कि दायाँ हाथ दे और बायाँ हाथ जान न पाए। अपने ही मुख से अपने गुणों का बखान करना उसी प्रकार है, जैसे दीपक की लौ को तेज़ हवा में उजागर कर देना—वह धीरे-धीरे बुझने लगती है।

भारतीय आध्यात्मिक परम्परा सदा से यह सिखाती आई है कि गुणों की सुगन्ध स्वतः फैलती है, उसे प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। यदि आपके कर्म में सच्चाई है, तो उसकी चर्चा दूसरों के मुख से होगी; स्वयं बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

यह चौपाई हमें विनम्रता, मौन और आन्तरिक पवित्रता का पाठ पढ़ाती है। सत्कर्म करें, परन्तु उन्हें अपने अहंकार का आहार न बनाएं। क्योंकि जब पुण्य अहंकार से जुड़ जाता है, तब वह पुण्य नहीं रह जाता।

यही मानस का मौन उपदेश है—

करो, पर दिखाओ मत।
सहयोग दो, पर जताओ मत।
अपना पुण्य बचाना है अगर,
तो जगह-जगह उसे गाओ मत।

Monday, January 19, 2026

अत्यंत विशेष है श्रीरामचरितमानस का आरंभ और समापन


श्रीरामचरितमानस का प्रारम्भ और समापन केवल काव्यात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण ग्रन्थ की दार्शनिक संरचना और भक्ति-मार्ग की पूर्ण यात्रा को संकेतित करता है। आदि और अंत-दोनों को साथ रखकर देखने पर मानस की आत्मा स्पष्ट होती है।

श्रीरामचरितमानस का प्रारंभ मंगलाचरण

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्

रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।

स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा

भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति॥

भावार्थः अनेक पुराण, वेद और (तंत्र) शास्त्र से सम्मत तथा जो रामायण में वर्णित है और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध श्री रघुनाथजी की कथा को तुलसीदासजी अपने अन्तःकरण के सुख के लिए अत्यन्त मनोहर भाषा रचना में विस्तृत करता है॥

व्याख्याः यह केवल प्रमाण-सूची नहीं, बल्कि एक वैदिक उद्घोष है। तुलसीदास जी यह स्थापित करते हैं कि रामकथा किसी एक सम्प्रदाय या ग्रन्थ तक सीमित नहीं, बल्कि वेद, पुराण, आगम और लोक-परम्परा - सबका समन्वय है। यहाँ “स्वान्तः सुखाय” अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह आत्मकेन्द्रित सुख नहीं, बल्कि अहंकार-शून्य अन्तःकरण में उत्पन्न ब्रह्मानन्द का संकेत है। तुलसी स्वयं को साधक मानते हैं, कर्ता नहीं - यहीं से मानस का अद्वैत-भक्ति स्वरूप आरम्भ होता है। ग्रंथ के प्रारंभ में ही गोस्वामी जी यह घोषणा करते हैं कि अपने प्रभु की लीला का यह वर्णन मैं अपने मन के आनंद के लिए भाषाबद्ध कर रहा हूं। इसके पीछे कोई लोक वासना या कामना नहीं हैं। यह बहुत बड़ा उद्घोष है। आज का मनुष्य अपने हर कार्य के पीछे कोई न कोई इच्छा जोड़कर ही आगे बढ़ता है। बिना किसी कामना के कोई कार्य करने को तैयार ही नहीं। निरंतर उसके मन में कार्य की सफलता का सुख या विफलता का भय व्याप्त रहता है। लेकिन गोस्वामी जी यह सब कामनाएं लेकर आगे नहीं बढ़े, बस अपने प्रभु की भक्ति में लीन होकर अपनी रचना पर कार्य किया। आज कोई छोटी सी भी किताब लिखता है, तो जगह-जगह उसका प्रचार करता है, जगह-जगह उसका विमोचन करवाया जाता है तब भी वह पुस्तक चली, न चली। लेकिन गोस्वामी जी का यह ग्रंथ अगर सदियों से जन-जन का प्रिय बना हुआ है और मानव मात्र का मार्गदर्शन करता चल रहा है, तो उसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही है कि यह ग्रंथ गोस्वामी जी ने अपने अंतःकरण के सुख के लिए लिखा, निष्काम भाव से।।

समापन दोहा (शरणागति का चरम बिन्दु)

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।

अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर॥

भावार्थ: हे श्री रघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान दीनों का हित करने वाला कोई नहीं है। ऐसा विचार कर, हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरण रूपी भयानक दुःख का हरण कीजिए।

व्याख्या: यह दोहा श्रीरामचरितमानस की सम्पूर्ण साधना का निष्कर्ष और सार है। यहाँ ‘दीनता’ किसी सामाजिक या आर्थिक अभाव का संकेत नहीं, बल्कि पूर्ण आत्मसमर्पण की आध्यात्मिक अवस्था है। भक्त स्वीकार करता है कि अब उसके पास अपना कुछ भी नहीं- न बल, न बुद्धि, न साधना और न ही कोई अन्य आश्रय। इसी क्षण प्रभु को ‘दीनहित’ कहा गया है- अर्थात् जिसकी करुणा शरणागत के लिए स्वतः प्रवाहित होती है।

यह दोहा कर्म, ज्ञान और योग- तीनों से आगे की अवस्था का द्योतक है, जहाँ केवल कृपा ही साधन और साध्य बन जाती है। गोस्वामी जी यहाँ प्रभु को आदेश नहीं देते, तर्क नहीं करते- वे केवल अपने दीनत्व को प्रस्तुत करते हैं। यही सच्ची शरणागति है।

अन्तिम दोहा (अनन्य प्रेम की पराकाष्ठा)

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।

तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥

भावार्थ: जैसे कामी को स्त्री प्रिय लगती है और जैसे लोभी को धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथ! हे राम! आप मुझे निरन्तर प्रिय लगते रहें।

व्याख्या: यह दोहा भक्ति का चरम शिखर है। यहाँ गोस्वामी तुलसीदास जी न मुक्ति की कामना करते हैं, न वैकुण्ठ की और न ही मोक्ष की। वे केवल इतना चाहते हैं कि राम-प्रेम स्वाभाविक, निरन्तर और अविच्छिन्न बना रहे।

गोस्वामी जी ने यहाँ जो लौकिक उपमाएँ दी हैं, वे प्रत्येक मनुष्य के जीवन से गहराई से जुड़ी हुई हैं। कामी पुरुष की स्त्री के प्रति आसक्ति और लोभी की धन के प्रति तृष्णा - इनकी तीव्रता और गहराई को जीवन के किसी न किसी चरण में हर व्यक्ति अनुभव करता है। इसी अनुभूति को आधार बनाकर गोस्वामी जी अपने आराध्य श्रीराम के प्रति उसी तीव्रता का प्रेम माँगते हैं।

संकेत अत्यन्त आध्यात्मिक है - जैसे विषयासक्ति बिना विशेष प्रयास के बनी रहती है, वैसे ही राम-प्रेम भी साधना भर न रहकर स्वभाव बन जाए।


यहीं श्रीरामचरितमानस की यात्रा पूर्ण होती है-

मंगलाचरण में निष्काम आरम्भ,

और समापन में पूर्ण शरणागति एवं अनन्य प्रेम।

इस प्रकार श्रीरामचरितमानस का प्रारम्भ शास्त्रीय समन्वय और विनय से होता है तथा उसका अंत भक्त और भगवान के अभेद प्रेम में विलीन हो जाता है-यही इसकी सनातन पूर्णता है।

Wednesday, September 3, 2014

कृष्ण और राम से सीखें जनता के साथ ‘पर्सनल टच’ रखना

मधुबन में गोपियों संग रचाया गया रास भगवान कृष्ण की जीवनी का महत्वपूर्ण अंग है। रासलीला के बिना श्री कृष्ण की लीला अधूरी है। रास एक विशेष प्रकार का नृत्य होता है, जिसमें एक नायक होता है जो अनेक नायिकाओं के संग घूम-घूम कर नृत्य करता है। श्री कृष्ण को रास में महारथ हासिल थी। कहा जाता है कि श्री कृष्ण एक घेरे में नृत्य कर रही गोपियों के संग इतनी तीव्र गति से नृत्य करते थे कि प्रत्येक गोपी को यही लगता था कि कृष्ण केवल उन्हीं के संग नृत्य कर रहे हैं किसी और गोपी के पास जा ही नहीं रहे। जबकि वास्तविकता में श्री कृष्ण की गति इतनी तेज होती थी कि हर गोपी को यही लगता था कि कन्हैया केवल उन्हीं के साथ नृत्य कर रहे हैं। 

इसी प्रकार रामायण में भी एक ऐसा प्रसंग आता है जब भगवान राम पल भर में अनेक लोगों का अभिवादन
स्वीकारते हैं। लंका विजय के बाद जब श्री राम पुष्पक विमान से अयोध्या नगरी में पधारते हैं तो हजारों अयोध्यावासी नम आंखों के साथ उनके स्वागत में खड़े मिले। यहां भगवान राम ने ऐसी लीला रचाई कि वो प्रत्येक नगर वासी के साथ निजी तौर पर मिले। श्री राम हर नगरवासी का एक-एक करके अभिवादन स्वीकार करते हैं, पर उनकी गति इतनी तेज है कि इस काम में उनको बहुत देर नहीं लगी। और हर नगर वासी इस बात को लेकर खुश और संतुष्ट दिखा कि राम ने बड़े प्यार से निजी तौर पर उनके हालचाल लिये।

कहने का भाव ये है कि संबंधों में ‘पर्सनल टच’ हमेशा आपको करीब लाता है। लेकिन भारत में चली आ रही लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में शासन और जनता के बीच ये ‘पर्सनल टच’ मिसिंग है। 67 साल से ये हालात हैं कि आम जनता सरकार के साथ खुद को जुड़ा हुआ महसूस नहीं करती। अबकी बार आम चुनाव में जब नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया के साथ-साथ पूरे देश में घूम-घूम कर सैकड़ों रैलियों को संबोधित किया तो लोगों ने खुद को उनसे जुड़ा हुआ महसूस किया और परिणाम सबके सामने है। जरूरत इस बात की है कि सत्ता में बैठने के बाद भी शासक जनता के साथ जुड़ाव बनाए रखे। सत्ता के कोलाहल में जनता की आवाज दबनी नहीं चाहिए। लेकिन लोकतांत्रिक दस्तूर ऐसा रहा है जिसमें सत्ता मिलने के बाद जनता को हाशिए पर डाल दिया जाता है और पांच साल बाद ही उसकी सुध आती है। 

हाल ही मोदी सरकार ने http://mygov.nic.in/ पोर्टल की शुरुआत करके आम लोगों से जुड़ने का एक अच्छा प्रयोग किया है, पर सवा सौ करोड़ के देश के लिए ये प्रयास अभी छोटा है इसे और वृहद आकार देने की जरूरत है। इस तरह के प्रयास राज्यों के स्तर पर शुरू होने जरूरी है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कार्यालय टेक्नोलाॅजी के स्तर पर इतने सशक्त होने चाहिए कि देश के प्रत्येक जिले के प्रत्येक गांव में क्या घटित हो रहा है इसकी पल-पल की जानकारी वहां उपलब्ध रहे। अभी हो ये रहा है कि जिला प्रशासन भी सूचनाओं के लिए मीडिया पर निर्भर रहता है, पीएम और सीएम तो बहुत दूर की बात है। टेक्नोलाॅजी के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारें आम जनता के साथ इस तरह का पर्सनल टच स्थापित कर सकती हैं। इसके अलावा राजधानी की सीमाओं से बाहर निकलकर निजी तौर पर लोगों के बीच दौरा करने के बार-बार कारण खोजना भी शासक को जनता के साथ जोड़ता है। लेकिन, ‘मेरा इस जगह से गहरा रिश्ता है और यहां आकर मुझे बेहद खुशी मिली’ जैसे रटे-रटाये परंपरागत भाषण देने से काम नहीं चलेगा। अब समय है कुछ नया करने का।

Monday, July 4, 2011

अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने में नुकसान ही नुकसान है!!!

जब भी हम कोई अच्छा या उल्लेखनीय काम करते हैं, तो हमारे मन में कहीं न कहीं उसको लेकर गर्व की भावना आ जाती है। फिर हम ये कोशिश करते हैं कि उसकी चर्चा अधिक से अधिक लोगों से की जाए, ताकि हमारा नाम हो। अपने अंदर की जो कमियां हैं उनकी चर्चा हम किसी से नहीं करते, लेकिन जैसे ही कोई उपलब्धि हासिल की, तो लगते हैं अपना गुणगान करने। ऐसा ही नारद जी ने भी किया। रामचरितमानस का नारद मोह प्रसंग आज-कल के समाज पर एकदम खरा उतरता है। हिमालय की कंदराओं से गुजरते हुए नारद मुनि को जब एक मनोरम स्थान दिखाई दिया तो स्वभाव और शाप के कारण चलायमान नारद मुनि वहां ठहर गए। ठहरे भी ऐसे कि समाधि लग गई। जैसा कि इंद्र का स्वभाव रहा है, देवराज इंद्र को उनकी वो दशा देखकर बेहद घबराहट हुई और उनको अपना सिंहासन खतरे में दिखाई देने लगा। उन्होंने नारद मुनि की समाधि भंग करने के लिए कामदेव और इंद्र लोक की कुछ निपुण अप्सराओं को भेजा। लेकिन नारद मुनि पर उनकी कोई काम कला नहीं चली। वे अविचल अपनी समाधि में बैठे रहे। हारकर कामदेव ने उनसे क्षमा मांगी और वहां से चला गया। नारद मुनि ने बिना कोई क्रोध किए उसको क्षमा कर दिया।

बस यहीं से नारद मुनि के अंतःकरण में गर्व के बीज अंकुरित हो गए। उन्हें इस बात का बड़ा अभिमान हुआ कि उन पर कामदेव का भी असर नहीं हुआ और उन्होंने कामदेव को हरा दिया। फिर क्या था उन्होंने सीधे जाकर ये प्रसंग शिव जी को सुना दिया। भोलेनाथ ने वो प्रसंग ध्यान से सुना और मुनि की प्रशंसा की, लेकिन साथ ही उन्होंने नारद को सीख भी दी कि वो ये प्रसंग इस तरह से जाकर विष्णु जी को न सुनाएं।

बार बार बिनवउँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायहु मोही।।

तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूंँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ।।

लेकिन नारद मुनि को लगा कि शायद शिव जी को उनकी सफलता से ईष्र्या हो रही है और उन्होंने शिव जी की बात को नजरंदाज करके उसी अभिमान के साथ पूरा प्रसंग जाकर विष्णु जी को सुना दिया। भगवान अपने भक्त के हृदय में अहंकार नहीं देख सकते थे, सो उन्होंने नारद मुनि का अहंकार भंग करने की ठान ली। उसके बाद उन्होंने विश्वमोहिनी के स्वयंवर के माध्यम से जो नारद जी का अहंकार तोड़ा वो सबको पता है।

आज हम सबकी स्थिति नारद मुनि की भांति ही होकर रह गई है। जरा-जरा सी सफलताएं भी हम से हजम नहीं हो पाती हैं। लगते हैं हम उनका ढोल पीटने। इस प्रचलन के चक्कर में हम अपने बच्चों का सबसे ज्यादा नुकसान करते हैं। बचपन में नर्सरी, केजी में पढ़ रहे बच्चे की जरा सी सफलता का उनकी मम्मियां पड़ोसियों के सामने ऐसा गुणगान करेंगी मानो कोई आॅक्सफोर्ड की प्राप्त कर ली हो। बच्चे की इतनी ज्यादा प्रशंसा उसके लिए आगे चलकर नुकसानदायक साबित होती है। फिर उन्हीं मम्मियों का कथन होता है- बचपन में तो ये पढ़ने में बहुत अच्छा था, पर ज्यों-ज्यों बड़ा होता गया, पता नहीं इसको क्या होता चला गया।

गीता में भगवान कृष्ण का भी यही संदेश है कि कर्म करो, पर उसमें कर्तापन का भाव न हो। कर्म का फल ईश्वर की देन है, न उसका गर्व करना है और न शोक मनाना है। रही बात यश की तो अच्छे कर्मों का यश खुद-ब-खुद फैलता है। उसके लिए किसी अखबार या न्यूज चैनल को प्रेस विज्ञप्ति भेजने की जरूरत नहीं है। आज भारत में तमाम ऐसे सामाजिक संगठन हैं जो कभी अपने कार्यक्रमों में मीडिया को नहीं बुलाते। उनका काम ही उनकी पहचान है। पहचान बनाने के लिए वो मीडिया को बुलाकर प्रेस ब्रीफिंग का रास्ता नहीं चुनते, बल्कि अपना पूरा ध्यान अपने काम पर केंद्रित रखते हैं। फिर क्या मीडिया और क्या सरकार, सब अपने आप उनको पहचानने लगते हैं।

लेकिन आज स्थिति एकदम उल्टी है। पान के खोखे से लेकर सीईओ के आॅफिस तक लोग अपने बारे में डींगें मारते दिखेंगे। मैंने ये किया, वो किया... सबकी बैंड बजा दी... कोई मेरे सामने टिक नहीं सकता... मैं नहीं होता तो उस दिन अनर्थ हो जाता.... वगैराह, वगैराह। हम इतने आत्ममुग्ध हो जाते हैं कि अपनी तरक्की का मार्ग ही बंद कर लेते हैं। हृदय में पल रहा अहंकार इतना बड़ा हो जाता है कि आगे बढ़ने ही नहीं देता। इसलिए सोच समझकर बोलें, अगर नहीं समझ आ रहा है कि कैसे किसी बात की चर्चा की जाए तो चुप रहने में ही भलाई है, क्योंकि मुंह से निकली हर बात के गहरे परिणाम निकलते हैं।

Thursday, March 31, 2011

हनुमान जी सिखाते हैं टार्गेट अचीव करना!

सीता जी की खोज में जब समुद्र लांघकर लंका जाने की बात आई तो पूरी वानर सेना असमर्थ नजर आई। उस समय जामवंत ने हनुमान को उनकी शक्ति का स्मरण कराया। तब हनुमान ये कठिन काम अपने कंधों पर लिया और बखूबी कर के दिखाया। इस ओर से समुद्र लांघकर सीता जी के दर्शन तक के सफर में हनुमान के साथ कई घटनाएं घटीं। सबसे पहले मैनाक पर्वत ने उनसे थोड़ा आराम करने को कहा, फिर परीक्षा लेने के लिए सुरसा आई, फिर समुद्र में रहने वाली सिंघिका राक्षसी का वध करना पड़ा, फिर लंका के द्वार पर लंकिनी ने रोका, उसके बाद विभीषण से मुलाकात हुई, तब विभीषण के बताए मार्ग पर चलकर उनको सीता जी के दर्शन हुए।

इस पूरे घटनाक्रम से आज के जीवन में कई चीजें सीखने वाली हैं। जब हम कोई काम अपने हाथ में लेते हैं तो जैसा हनुमान के साथ हुआ वैसा ही हम सबके साथ भी होता है और हम मंजिल तक पहुंचने से पहले ही हिम्मत हार जाते हैं। किसी भी काम को हाथ में लेते वक्त ये बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि रास्ते में व्यवधान आएंगे ही आएंगे। हमें उन व्यवधानों का सामना अपनी बुद्धि और अपने विवेक से करना है।

सबसे पहला व्यवधान है मैनाक पर्वत- यानि हमारा आलस्य। हर कंपनी में दो तरह के कर्मचारी होते हैं। एक वे जो काम को हाथ में लेने के बाद तब तक शांत नहीं बैठते जब तक कि वो पूरा न हो जाए। दूसरे वे जो काम पूरा करने के लिए डेडलाइन का इंतजार करते हैं। पहले किस्म के कर्मचारी अपना काम ज्यादा व्यवस्थित ढंग से पूरा करते हैं जबकि दूसरे किस्म के लोग हबड़धबड़ में काम को पूरा करते हैं। तो हनुमान बता रहे हैं कि काम के प्रति ऐसी लगन होनी चाहिए कि आपको भूख, प्यास और थकान जैसी चीजों का एहसास ही न हो। हनुमान जी ने कब खाने की मांग की जब उन्होंने सीता की दर्शन कर लिए। खुद सीता जी से ही कहा कि माता मुझे अब भूख लग रही है। उसी तरह कुशल टीम लीडर्स अपना काम और अपना टार्गेट पूरा करने के बाद पूरी टीम के साथ सेलिब्रेट करते हैं।

फिर हनुमान के सामने दूसरा व्यवधान आया- सुरसा। उसने हनुमान से उसकी भूख मिटाने को कहा। तब हनुमान ने अपनी चतुराई से सुरसा को जीता। इसी तरह जब आप किसी बडे़ प्रोजेक्ट को हाथ में लेते हो तो कई तरह की सुरसाएं आपसे अपनी रिक्वायरमेंट पूरी करने की डिमांड करती हैं। कहीं आपको लालफीताशाही रोकती है तो कहीं फैमिली की समस्याएं। ऐसे में आपको अपने विवेक का इस्तेमाल करना और कम समय वेस्ट करते हुए उनकी रिक्वायरमेंट को पूरा करना है। विनम्र आचरण बनाए रखते हुए अपना ध्यान अपने मेन टार्गेट पर लगाए रखना है।

इसके बाद हनुमान जी के सामने सिंघिका आई। ंिसंघिका आकाश में उड़ने वाले जीवों की परछाईं को पकड़कर उनको खा लेती थी। वही काम उसने हनुमान के साथ भी किया। इस बार हनुमान ने बिना कोई समय बर्बाद किए उसका वध करना उचित समझा। ये जो सिंघिका है ये आपके आसपास बिखरे अनवांटेड ऐलीमेंट्स हैं। जो आपकी टांग खींचते रहते हैं या आॅफिस में पाॅलिटिक्स करते रहते हैं। तो ऐसे लोगों की तरफ बिल्कुल ध्यान न देते हुए उनकी बात न सुनते हुए उनको पूरी तरह इग्नोर करना है। अगर आप उनके साथ उलझेंगे तो आपका अपना नुकसान होगा, जो वे चाहते हैं।

फिर हनुमान का सामना लंकिनी से हुआ। पहले तो हनुमान ने उससे बचकर निकलने की कोशिश की। लेकिन उसने उन्हें नहीं जाने दिया। तब हनुमान ने एक घूंसा मारकर उसको अपनी शक्ति का एहसास करा दिया। एक घूंसा पड़ते ही उसने आत्मसमर्पण कर दिया और हनुमान को आगे जाने दिया। ऐसे ही जब आप अपने टार्गेट के बहुत पास पहुंचने वाले होते हो तो कुछ बाधाएं खड़ी हो जाती हैं। ऐसा लगता है मानो अब ये काम पूरा नहीं हो पाएगा। लेकिन इन परिस्थितियों में आपको अपनी जिद पर अड़ जाना है और अपनी आत्मशक्ति को जगाकर खुद में पाॅजिटिव एनर्जी जनरेट करनी है। आपके अंदर की जो पाॅजिटिव एप्रोच है वो बहुत जरूरी है किसी टार्गेट को अचीव करने के लिए।

जब हनुमान लंका के अंदर गए तो सीता को खोज नहीं पाए। तब उनको विभीषण का घर दिखा। उसके आसपास के वातावरण से उन्होंने अंदाजा लगाया कि ये व्यक्ति सज्जन है। इससे मित्रता करनी चाहिए। ये जरूर मेरी मदद करेगा। फिर वही हुआ जैसा हनुमान ने सोचा था। विभीषण ने उनको सीता का सही पता बताया। बदले में हनुमान ने उन्हें राम जी से मिलवाने का आश्वासन दिया। इसी तरह जब हम किसी बड़े काम को हाथ में लेकर आगे बढ़ते हैं, तो हमारे आसपास कई अच्छे और अनुभवी लोग भी होते हैं। लेकिन हम अपनी ईगो के चलते उनकी मदद लेना उचित नहीं समझते। हमें ऐसे लोगों को पहचानकर उनकी मदद लेनी चाहिए। इससे हमारी मंजिल हमको जल्दी मिल सकती है। वरना काफी समय बर्बाद होगा। लेकिन ये रिश्ता एकदम क्षणिक और स्वार्थ आधारित नहीं होना चाहिए। हमें ऐसे लोगों से लांग टर्म रिलेशन बनाने चाहिए। उनको भी कभी मदद की जरूरत पड़े तो हमें भी उनकी मदद करनी चाहिए। जैसे बाद में हनुमान ने विभीषण को राम से मिलवाने में मदद की। 

Friday, December 10, 2010

मठाधीश होने के मायने!

"राम राज्य में प्रजा सर्वोपरि थी. प्रजा का कार्य राजा की सर्वोच्च प्राथमिकता थी. राजा राम राज भवन में आकर हर रोज लक्ष्मण को आज्ञा देते कि देखो लक्ष्मण द्वार पर कोई कार्यार्थी तो नहीं आया है. लेकिन राम राज्य में व्यवस्था कुछ ऐसी थी कि लोगों को काम लेकर राजा के पास आने की जरूरत नहीं पड़ती थी. हर रोज लक्ष्मण बाहर जाकर देखते और लौटकर यही जवाब देते कि द्वार पर कोई भी नहीं है. एक बार लक्ष्मण जब बाहर देखने गए तो उनको एक कुत्ता दिखा, जिसके माथे से रक्त बह रहा था और वो लक्ष्मण की ओर ही देख रहा था. लक्ष्मण ने उससे पूछा कि उसको क्या काम है, तो कुत्ते  ने कहा कि वह अपनी बात राजा राम से ही कहना चाहता है. लक्ष्मण ने ये बात राज सभा में जाकर बताई तो राजा राम ने तुरंत उस कुत्ते को अन्दर बुलवाया. 
राजा राम ने उससे पूछा कि उसकी ये हालत किसने की है तो उसने बताया कि- नगर में सर्वार्थसिद्ध नमक एक विद्वान भिक्षु है तो ब्राह्मणों के घर में रहता है उसने अकारण ही मुझ पर प्रहार किया है. मैंने उसका कोई अपराध नहीं किया था. राजन आप मुझे न्याय दें. 

कुत्ते की बात सुनकर राजा राम ने एक द्वारपाल को भेजकर सर्वार्थसिद्ध नाम के उस भिक्षु को बुलवा लिया. राजा राम ने उस भिक्षु से पूछा कि- तुमने अकारण ही इस कुत्ते पर क्यों प्रहार किया. तब उस भिक्षु ने जवाब दिया कि महाराज मेरा मन क्रोध से भर गया था इसलिए मैंने इसे डंडे से मारा. भिक्षा का समय बीट चुका था तब भी भूखा होने के कारण मैं भिक्षा के लिए दर दर घूम रहा था. ये कुत्ता बीच रस्ते में खड़ा था. मैंने बार बार कहा कि मेरे रस्ते से हट जाओ, लेकिन ये अपनी ही चाल में मस्त चला जा रहा था. भूख के कारण क्रोध आ गया और मैंने इस पर प्रहार कर दिया. मैं अपराधी हूँ आप मुझे दंड दीजिये. राजा से दंड पाकर मेरा पाप नष्ट हो जायेगा. 

तब राजा राम ने अपने सभासदों से पूछा कि इस भिक्षु को क्या दंड दिया जाए क्योंकि दंड का सही प्रयोग करने पर ही प्रजा सुरक्षित है. राम की राजसभा में उस समय बहुत से विद्वान मौजूद थे उन सभी ने मंथन करने के बाद राजा से कहा कि- महाराज ब्राह्मण दंड द्वारा अवध्य है. उसको शारीरिक दंड नहीं मिलना चाहिए, यही शास्त्रों का मत है. लेकिन राजा सबका शासक होता है.

उन सबकी ऐसी मंत्रणा सुनकर उस कुत्ते ने कहा कि महाराज आपने  प्रतिज्ञापूर्वक मुझे न्याय देने की बात कि है. अगर आप मुझ से संतुष्ट हैं और मेरी इच्छानुसार वर देना चाहते हैं तो मेरी बात सुनिए. आप इस ब्राह्मण को मठाधीश बना दीजिये. इसको कालंजर में एक मठ का आधिपत्य प्रदान कर दीजिये.

राजा राम ने तुरंत उस ब्राह्मण को मठाधीश घोषित कर दिया. इस प्रकार वह ब्राह्मण बहुत खुश हुआ और हाथी की पीठ पर बैठाकर उसको वहां से विदा किया गया.

तब राजा राम के मंत्रियों ने मुस्कुराते हुए पूछा कि महाराज ये दंड था या पुरस्कार. इसपर राजा राम ने कहा कि कर्मों की गति बड़ी गहरी और न्यारी है, किस कर्म का क्या नतीजा भोगना पड़ता है इसका तुमको नहीं पता ये इस कुत्ते को पता है. फिर श्री राम की पूछने पर उस कुत्ते ने पूरी सभा के समक्ष बताया- जघुनंदन मैं पिछले जन्म में कालंजर के मठ में मठाधीश था और धर्मानुकूल आचरण करता था. मुझे ज्ञात नहीं मैंने पड़ पर रहते हुए कोई धर्म के प्रतिकूल कर्म किया हो. लेकिन फिर भी मुझे ये घोर अवस्था और अधम गति मिली. तो सोचिये ये ब्राह्मण जो इतना क्रोधी है, धर्म छोड़ चुका है, दूसरों का अहित करता है, क्रूर, कठोर, मूर्ख और अधर्मी है, ये तो अपने साथ ऊपर और नीचे की सात पीढ़ियों को भी नर्क में गिरा देगा."

ये प्रसंग अचानक मुझे वाल्मीकि रामायण में मिल गया. मुझे लगा कि इसको लिखना बहुत जरूरी है. आज जहाँ देखो मठाधीशों का बोलबाला है. तमाम संस्थाओं के मुखिया बने बैठे लोग एक तरह से मठाधीश ही तो हैं. पत्रकारिता में तो ये शब्द खासतौर से विद्यमान है. महर्षि वाल्मीकि ने इस प्रसंग के माध्यम से बहुत सरल तरीके से समझा दिया है कि मठाधीश होने के क्या मायने होते हैं. जो लोग छोटी-छोटी संस्थाओं के प्रमुख होने के नाते बड़े-बड़े अहंकार पाले बैठे हैं उनके लिए इस प्रसंग में कई सन्देश छिपे हैं. पत्रकारिता के मठाधीशों को तो कम से कम समझ ही लेना चाहिए कि उनका भविष्य कैसा हो सकता है.  सदग्रंथ हमें बड़े सहज तरीके से जीवनोपयोगी सूत्र बता देते हैं लेकिन हम हैं कि उनकी तरफ ध्यान ही नहीं देते. इस झूठी चमक-दमक से अगर बाहर निकलें तो शायद हमें जीवन की सच्चाइयाँ खुद-ब-खुद समझ आ जाएँ.