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Showing posts from 2011

अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने में नुकसान ही नुकसान है!!!

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जब भी हम कोई अच्छा या उल्लेखनीय काम करते हैं, तो हमारे मन में कहीं न कहीं उसको लेकर गर्व की भावना आ जाती है। फिर हम ये कोशिश करते हैं कि उसकी चर्चा अधिक से अधिक लोगों से की जाए, ताकि हमारा नाम हो। अपने अंदर की जो कमियां हैं उनकी चर्चा हम किसी से नहीं करते, लेकिन जैसे ही कोई उपलब्धि हासिल की, तो लगते हैं अपना गुणगान करने। ऐसा ही नारद जी ने भी किया। रामचरितमानस का नारद मोह प्रसंग आज-कल के समाज पर एकदम खरा उतरता है। हिमालय की कंदराओं से गुजरते हुए नारद मुनि को जब एक मनोरम स्थान दिखाई दिया तो स्वभाव और शाप के कारण चलायमान नारद मुनि वहां ठहर गए। ठहरे भी ऐसे कि समाधि लग गई। जैसा कि इंद्र का स्वभाव रहा है, देवराज इंद्र को उनकी वो दशा देखकर बेहद घबराहट हुई और उनको अपना सिंहासन खतरे में दिखाई देने लगा। उन्होंने नारद मुनि की समाधि भंग करने के लिए कामदेव और इंद्र लोक की कुछ निपुण अप्सराओं को भेजा। लेकिन नारद मुनि पर उनकी कोई काम कला नहीं चली। वे अविचल अपनी समाधि में बैठे रहे। हारकर कामदेव ने उनसे क्षमा मांगी और वहां से चला गया। नारद मुनि ने बिना कोई क्रोध किए उसको क्षमा कर दिया। बस यहीं से नारद...

हनुमान जी सिखाते हैं टार्गेट अचीव करना!

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सीता जी की खोज में जब समुद्र लांघकर लंका जाने की बात आई तो पूरी वानर सेना असमर्थ नजर आई। उस समय जामवंत ने हनुमान को उनकी शक्ति का स्मरण कराया। तब हनुमान ये कठिन काम अपने कंधों पर लिया और बखूबी कर के दिखाया। इस ओर से समुद्र लांघकर सीता जी के दर्शन तक के सफर में हनुमान के साथ कई घटनाएं घटीं। सबसे पहले मैनाक पर्वत ने उनसे थोड़ा आराम करने को कहा, फिर परीक्षा लेने के लिए सुरसा आई, फिर समुद्र में रहने वाली सिंघिका राक्षसी का वध करना पड़ा, फिर लंका के द्वार पर लंकिनी ने रोका, उसके बाद विभीषण से मुलाकात हुई, तब विभीषण के बताए मार्ग पर चलकर उनको सीता जी के दर्शन हुए। इस पूरे घटनाक्रम से आज के जीवन में कई चीजें सीखने वाली हैं। जब हम कोई काम अपने हाथ में लेते हैं तो जैसा हनुमान के साथ हुआ वैसा ही हम सबके साथ भी होता है और हम मंजिल तक पहुंचने से पहले ही हिम्मत हार जाते हैं। किसी भी काम को हाथ में लेते वक्त ये बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि रास्ते में व्यवधान आएंगे ही आएंगे। हमें उन व्यवधानों का सामना अपनी बुद्धि और अपने विवेक से करना है। सबसे पहला व्यवधान है मैनाक पर्वत- यानि हमारा आलस्य। हर कंपनी...