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मठाधीश होने के मायने!

"राम राज्य में प्रजा सर्वोपरि थी. प्रजा का कार्य राजा की सर्वोच्च प्राथमिकता थी. राजा राम राज भवन में आकर हर रोज लक्ष्मण को आज्ञा देते कि देखो लक्ष्मण द्वार पर कोई कार्यार्थी तो नहीं आया है. लेकिन राम राज्य में व्यवस्था कुछ ऐसी थी कि लोगों को काम लेकर राजा के पास आने की जरूरत नहीं पड़ती थी. हर रोज लक्ष्मण बाहर जाकर देखते और लौटकर यही जवाब देते कि द्वार पर कोई भी नहीं है. एक बार लक्ष्मण जब बाहर देखने गए तो उनको एक कुत्ता दिखा, जिसके माथे से रक्त बह रहा था और वो लक्ष्मण की ओर ही देख रहा था. लक्ष्मण ने उससे पूछा कि उसको क्या काम है, तो कुत्ते  ने कहा कि वह अपनी बात राजा राम से ही कहना चाहता है. लक्ष्मण ने ये बात राज सभा में जाकर बताई तो राजा राम ने तुरंत उस कुत्ते को अन्दर बुलवाया.  राजा राम ने उससे पूछा कि उसकी ये हालत किसने की है तो उसने बताया कि- नगर में सर्वार्थसिद्ध नमक एक विद्वान भिक्षु है तो ब्राह्मणों के घर में रहता है उसने अकारण ही मुझ पर प्रहार किया है. मैंने ...

हम अपने पिता का कहना नहीं मानते!

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महात्मा गांधी का सपना था कि भारत में रामराज्य की स्थापना हो और उन्होंने ये सपना भारत के लोगों को भी दिखाया। १५ अगस्त १९४७ से लेकर अब तक भारत में गाहे-बगाहे राम राज्य की चर्चा किसी न किसी मंच से होती आई है। लेकिन अगर पॉलिटिकल पंडितों की मानें तो 'राम राज्य' एक यूटोपिया है, एक ऐसा काल्पनिक शब्द जिसका इस्तेमाल कर राजनीतिज्ञ आवाम को भ्रम में रखते हैं। फिर भी राम राज्य आज भी भारत की आवाम का सपना है। एक ऐसा सपना जो दिमाग में खिंची धर्म की दीवारों को तोड़ चुका है। राम मंदिर पर भले ही तलवारें खिंची हों, लेकिन राम राज्य भारत में आए इसपर सब सहमत हैं। पहले ये सपना गांधी ने दिखाया और फिर भाजपा ने। लेकिन ये सपना केवल मंच, माइक और रैलियों तक ही सिमटा रहा। इसको हकीकत में बदलने की कोशिश न महात्मा गांधी की कांग्रेस ने ही की और न भाजपा ने। भाजपा भले ही केंद्र में लंबे समय तक न रही हो, लेकिन कई राज्यों में वह लगातार कब्जा जमाए है और वहां भी राम राज्य की दिशा में कोई ठोस प्रयोग होता नहीं दिखता। शायद यही कारण है कि राम राज्य को यूटोपिया का दर्जा दिया गया। यहां संक्षेप में ये भी बताते चलें कि जिस र...

सुख-दुःख की पहचान जरुरी है

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रामचरितमानस में जब गरुण ने काकभुसुंडी जी से पूछा कि संसार का सबसे बड़ा सुख और सबसे बड़ा दुख क्या है तो इस सवाल का जवाब गोस्वामी जी ने कुछ इस प्रकार कहलवाया- नहिं दरिद्र सम दुःख जग माही। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥ यानी दरिद्रता के समान संसार में कोई दुःख नहीं है जबकि संत के मिलन के समान संसार में कोई सुख नहीं। वैसे दरिद्रता का उल्टा तो सम्पन्नता होता है। जब दरिद्रता सबसे बड़ा दुःख है तो सम्पन्नता सबसे बड़ा सुख होना चाहिए। लेकिन गोस्वामी जी ने सम्पन्नता में सुख नहीं बताया। उन्होंने सुख बताया संतों के दर्शन में। और संत का मतलब भी केवल भगवाधारियों से नहीं है, अर्थ है व्यक्ति के स्वभाव से। संत स्वभाव वाले लोगों का संग करने के समान संसार में सुख नहीं। गोस्वामी जी ने एक ही चौपाई में पूरी बात समझा रखी है। लेकिन दुनिया समझने को तैयार नहीं। ऊपर से लेकर नीचे तक सब पैसे की दौड़ में शामिल हैं। पूरा ध्यान इसी तरफ है कि अधिक से अधिक पैसा किस तरह कमाया जाये। चलिए कमाने में कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन ये क्या कि पैसे कमाने के चक्कर में दूध की जगह यूरिया बेचा जा रहा है, धनिये की जगह घोड़े की लीद, मावे की...

नाम पर नहीं अपने काम पर ध्यान दें

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राम काज करिबे को आतुर, हनुमान जी को राम काज कि इतनी लगन थी कि उन्होंने कभी अपना ध्यान ही नहीं किया। उनको न नाम की चिंता थी, न आराम की, न किसी मान और सम्मान की चाह। उनके लिए तो बस राम जी का काज होना जरुरी था। जब भगवन राम का संधि प्रस्ताव लेकर अंगद को रावण के पास जाना पड़ा तब रावण ने अंगद से कहा कि राम की सेना में एक भी ऐसा बलशाली नहीं जो मेरा मुकाबला कर सके। राम खुद पत्नी के वियोग में दुखी है, जामवंत बूढा है, विभीषण तो स्वाभाव से कायर है, सुग्रीव कितना वीर है सब जानते हैं, इनमें से कोई मेरे सामने नहीं ठहरता। लेकिन हाँ एक बन्दर है जो थोडा बलशाली है, जिसने लंका को आग लगे थी। बाकी सब तो बेकार हैं। इस पर अंगद ने रावण के दरबार में अपना पांव जमाकर अपने और राम के बल का एहसास रावण को करा दिया था। इसके बाद जब अंगद वापस अपने शिविर में आये तो उन्होंने हनुमान जी से यही पुछा कि तुमने पूरी लंका को जला दिया, रावण के मद को चूर कर दिया और वहां अपना नाम तक बता कर नहीं आये। रावण तुम्हारा नाम तक नहीं जानता। इस पर हनुमान जी का जवाब था कि मैं वहां अपना नाम करने गया था या राम जी का काम करने गया था। हनुमान जी ...

आशा का दूसरा नाम है त्रिजटा

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मनुष्य जीवन सुखों और दुखों का मिलाजुला सामुच्य है। जीवन में सुख हैं तो दुख भी हैं। ऐसा कोई भी नहीं जिसके जीवन में केवल सुख ही लिखे हों। विपत्ति हर किसी पर आती है। लेकिन विपत्ति की घड़ी का इंसान ने किस तरह सामना किया ये देखने की बात है। वैसे तो रामायण साफ कहती है कि 'धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परखिए चारी।।' लेकिन रामायण ये भी बताती है कि विपत्ति काल में ईश्वर आपको अकेला नहीं छोड़ता, कोई न कोई कारण आपके साथ ऐसा जोड़ देता है जो आपकी उम्मीद जगाए रखता है। जरूरत है तो बस ईश्वर के उस संकेत को समझने की। माता सीता का पूरा जीवन विपत्तियों से भरा रहा। इनमें सबसे बड़ी विपत्ति थी रावण द्वारा सीता का अपहरण। सीता जैसी पतिव्रता स्त्री के लिए राक्षस नगरी लंका में एक पल काटना भी मुश्किल था। लेकिन फिर भी उन्होंने श्री राम के इंतजार में वहां समय बिताया। आखिर कैसे। जिस स्त्री का पति के वियोग में एक पल भी जीना मुश्किल हो उसके लिए इतना समय बिताना कैसे संभव हो गया। अगर थोड़ा सा ध्यान दें तो हमें इसका जवाब मिल जायेगा। ये संभव हो सका त्रिजटा के संग की वजह से। घोर राक्षस नगरी में भी सीता को हिम्मत ब...