अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने में नुकसान ही नुकसान है!!!
जब भी हम कोई अच्छा या उल्लेखनीय काम करते हैं, तो हमारे मन में कहीं न कहीं उसको लेकर गर्व की भावना आ जाती है। फिर हम ये कोशिश करते हैं कि उसकी चर्चा अधिक से अधिक लोगों से की जाए, ताकि हमारा नाम हो। अपने अंदर की जो कमियां हैं उनकी चर्चा हम किसी से नहीं करते, लेकिन जैसे ही कोई उपलब्धि हासिल की, तो लगते हैं अपना गुणगान करने। ऐसा ही नारद जी ने भी किया। रामचरितमानस का नारद मोह प्रसंग आज-कल के समाज पर एकदम खरा उतरता है। हिमालय की कंदराओं से गुजरते हुए नारद मुनि को जब एक मनोरम स्थान दिखाई दिया तो स्वभाव और शाप के कारण चलायमान नारद मुनि वहां ठहर गए। ठहरे भी ऐसे कि समाधि लग गई। जैसा कि इंद्र का स्वभाव रहा है, देवराज इंद्र को उनकी वो दशा देखकर बेहद घबराहट हुई और उनको अपना सिंहासन खतरे में दिखाई देने लगा। उन्होंने नारद मुनि की समाधि भंग करने के लिए कामदेव और इंद्र लोक की कुछ निपुण अप्सराओं को भेजा। लेकिन नारद मुनि पर उनकी कोई काम कला नहीं चली। वे अविचल अपनी समाधि में बैठे रहे। हारकर कामदेव ने उनसे क्षमा मांगी और वहां से चला गया। नारद मुनि ने बिना कोई क्रोध किए उसको क्षमा कर दिया। बस यहीं से नारद...