Wednesday, January 28, 2026

अपने मुख से अपना गुणगान करने से क्षीण होते हैं पुण्य

 

छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती।

निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥

श्रीरामचरितमानस के लंका काण्ड में आई यह चौपाई केवल युद्ध-वर्णन नहीं है, बल्कि मानव जीवन के लिए एक अत्यन्त सूक्ष्म और गहन संकेत है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि युद्ध के दौरान राक्षसों की सेना दिन-रात उसी प्रकार घटती जा रही है, जैसे अपने ही मुख से कहने पर पुण्य क्षीण हो जाते हैं।

यह उपमा साधारण नहीं है। इसके भीतर जीवन का एक गूढ़ सत्य छिपा है। सामान्यतः हम मानते हैं कि सत्कर्म करने से पुण्य बढ़ते हैं, परन्तु तुलसीदास जी यहाँ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि सत्कर्म का प्रदर्शन, उसका प्रचार और आत्म-प्रशंसा—पुण्य को नष्ट कर देती है।

आज का समय आत्मप्रचार का समय बन गया है। कोई छोटा सा भी अच्छा कार्य हो—दान दिया, किसी की सहायता की, कार्यालय में सफलता मिली या कोई सामाजिक कार्य किया—तो तुरंत उसका प्रदर्शन आरम्भ हो जाता है। विशेष रूप से सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र कर दिया है। एक गरीब को भोजन कराया, तो उसके साथ ली गई तस्वीरें प्रमाण बन जाती हैं; मानो सहायता से अधिक उसका दिखाया जाना आवश्यक हो।

परन्तु मानस हमें सावधान करती है। सत्कर्म की शक्ति उसकी निःशब्दता में होती है। जो पुण्य ढिंढोरे के साथ किया जाए, वह भीतर से खोखला हो जाता है। पुराने बुजुर्ग भी कहा करते थे—दान ऐसा होना चाहिए कि दायाँ हाथ दे और बायाँ हाथ जान न पाए। अपने ही मुख से अपने गुणों का बखान करना उसी प्रकार है, जैसे दीपक की लौ को तेज़ हवा में उजागर कर देना—वह धीरे-धीरे बुझने लगती है।

भारतीय आध्यात्मिक परम्परा सदा से यह सिखाती आई है कि गुणों की सुगन्ध स्वतः फैलती है, उसे प्रचार की आवश्यकता नहीं होती। यदि आपके कर्म में सच्चाई है, तो उसकी चर्चा दूसरों के मुख से होगी; स्वयं बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

यह चौपाई हमें विनम्रता, मौन और आन्तरिक पवित्रता का पाठ पढ़ाती है। सत्कर्म करें, परन्तु उन्हें अपने अहंकार का आहार न बनाएं। क्योंकि जब पुण्य अहंकार से जुड़ जाता है, तब वह पुण्य नहीं रह जाता।

यही मानस का मौन उपदेश है—

करो, पर दिखाओ मत।
सहयोग दो, पर जताओ मत।
अपना पुण्य बचाना है अगर,
तो जगह-जगह उसे गाओ मत।

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