अपने मुख से अपना गुणगान करने से क्षीण होते हैं पुण्य
छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥ श्रीरामचरितमानस के लंका काण्ड में आई यह चौपाई केवल युद्ध-वर्णन नहीं है, बल्कि मानव जीवन के लिए एक अत्यन्त सूक्ष्म और गहन संकेत है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि युद्ध के दौरान राक्षसों की सेना दिन-रात उसी प्रकार घटती जा रही है, जैसे अपने ही मुख से कहने पर पुण्य क्षीण हो जाते हैं। यह उपमा साधारण नहीं है। इसके भीतर जीवन का एक गूढ़ सत्य छिपा है। सामान्यतः हम मानते हैं कि सत्कर्म करने से पुण्य बढ़ते हैं, परन्तु तुलसीदास जी यहाँ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि सत्कर्म का प्रदर्शन, उसका प्रचार और आत्म-प्रशंसा—पुण्य को नष्ट कर देती है। आज का समय आत्मप्रचार का समय बन गया है। कोई छोटा सा भी अच्छा कार्य हो—दान दिया, किसी की सहायता की, कार्यालय में सफलता मिली या कोई सामाजिक कार्य किया—तो तुरंत उसका प्रदर्शन आरम्भ हो जाता है। विशेष रूप से सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र कर दिया है। एक गरीब को भोजन कराया, तो उसके साथ ली गई तस्वीरें प्रमाण बन जाती हैं; मानो सहायता से अधिक उसका दिखाया जाना आवश्यक हो। परन्तु मानस हमें सावधान ...