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अपने मुख से अपना गुणगान करने से क्षीण होते हैं पुण्य

  छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥ श्रीरामचरितमानस के लंका काण्ड में आई यह चौपाई केवल युद्ध-वर्णन नहीं है, बल्कि मानव जीवन के लिए एक अत्यन्त सूक्ष्म और गहन संकेत है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि युद्ध के दौरान राक्षसों की सेना दिन-रात उसी प्रकार घटती जा रही है, जैसे अपने ही मुख से कहने पर पुण्य क्षीण हो जाते हैं। यह उपमा साधारण नहीं है। इसके भीतर जीवन का एक गूढ़ सत्य छिपा है। सामान्यतः हम मानते हैं कि सत्कर्म करने से पुण्य बढ़ते हैं, परन्तु तुलसीदास जी यहाँ यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि सत्कर्म का प्रदर्शन, उसका प्रचार और आत्म-प्रशंसा—पुण्य को नष्ट कर देती है। आज का समय आत्मप्रचार का समय बन गया है। कोई छोटा सा भी अच्छा कार्य हो—दान दिया, किसी की सहायता की, कार्यालय में सफलता मिली या कोई सामाजिक कार्य किया—तो तुरंत उसका प्रदर्शन आरम्भ हो जाता है। विशेष रूप से सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीव्र कर दिया है। एक गरीब को भोजन कराया, तो उसके साथ ली गई तस्वीरें प्रमाण बन जाती हैं; मानो सहायता से अधिक उसका दिखाया जाना आवश्यक हो। परन्तु मानस हमें सावधान ...

अत्यंत विशेष है श्रीरामचरितमानस का आरंभ और समापन

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श्रीरामचरितमानस का प्रारम्भ और समापन केवल काव्यात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह सम्पूर्ण ग्रन्थ की दार्शनिक संरचना और भक्ति-मार्ग की पूर्ण यात्रा को संकेतित करता है। आदि और अंत-दोनों को साथ रखकर देखने पर मानस की आत्मा स्पष्ट होती है। श्रीरामचरितमानस का प्रारंभ मंगलाचरण नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि। स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा भाषानिबन्धमतिमंजुलमातनोति॥ भावार्थः अनेक पुराण, वेद और (तंत्र) शास्त्र से सम्मत तथा जो रामायण में वर्णित है और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध श्री रघुनाथजी की कथा को तुलसीदासजी अपने अन्तःकरण के सुख के लिए अत्यन्त मनोहर भाषा रचना में विस्तृत करता है॥ व्याख्याः यह केवल प्रमाण-सूची नहीं, बल्कि एक वैदिक उद्घोष है। तुलसीदास जी यह स्थापित करते हैं कि रामकथा किसी एक सम्प्रदाय या ग्रन्थ तक सीमित नहीं, बल्कि वेद, पुराण, आगम और लोक-परम्परा - सबका समन्वय है। यहाँ “स्वान्तः सुखाय” अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह आत्मकेन्द्रित सुख नहीं, बल्कि अहंकार-शून्य अन्तःकरण में उत्पन्न ब्रह्मानन्द का संकेत है। तुलसी स्वयं को साधक मानते हैं, कर्ता नहीं - यहीं से मा...