मर्यादा का सूत्र: कहाँ जाना चाहिए और कहाँ नहीं
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥ तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥ (यद्यपि इसमें संदेह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए भी जाना चाहिए, तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जाने से कल्याण नहीं होता।) श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में आई यह चौपाई सामाजिक मर्यादा, आत्मसम्मान और विवेक का अत्यन्त सूक्ष्म सूत्र प्रस्तुत करती है। गोस्वामी तुलसीदास जी यहाँ केवल व्यवहार की बात नहीं करते, बल्कि जीवन की एक ऐसी परिस्थिति का समाधान देते हैं, जिससे लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी अवश्य गुजरता है। इस चौपाई का प्रसंग भगवान शिव और माता सती से जुड़ा है। सती जी अपने पिता प्रजापति दक्ष के यहाँ आयोजित यज्ञ में जाना चाहती हैं, परन्तु शिव जी से वैर रखने के कारण दक्ष ने अपनी पुत्री को आमंत्रित नहीं किया था। तब भगवान शिव सती जी को समझाते हैं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए जाना अनुचित नहीं माना जाता, क्योंकि वहाँ अधिकार और आत्मीयता का संबंध होता है। किन्तु वे यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि जहाँ विरोध, उपेक्षा या तिरस्क...