“जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू…” — जब चाहत संकल्प बन जाती है
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलई न कछु संदेहू॥ गोस्वामी तुलसीदास जी की श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई देखने में जितनी सरल है, अर्थ में उतनी ही गहरी। इसका सामान्य अर्थ है— जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे निश्चय ही प्राप्त करता है; इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन ‘सत्य सनेहू’ केवल प्रेम या भावनात्मक लगाव नहीं है। यही इस चौपाई की सबसे गहरी बात है। यहाँ ‘सत्य सनेह’ को यदि व्यापक अर्थ में देखें, तो यह उस सच्ची, निष्ठापूर्ण और पूर्ण समर्पित चाहत का प्रतीक है, जिसमें मनुष्य किसी लक्ष्य को केवल चाहता नहीं, बल्कि उसके लिए स्वयं को पूरी तरह लगा देता है। हम अक्सर जीवन में चाहते बहुत कुछ हैं—लेकिन क्या हम उसे पूरी सच्चाई से चाहते हैं? यही प्रश्न इस चौपाई को आज के जीवन के लिए अत्यंत प्रासंगिक बना देता है। चाहत और सच्ची चाहत में अंतर हम कहते हैं— “मुझे यह नौकरी चाहिए।” “मुझे आगे बढ़ना है।” “मुझे स्वस्थ होना है।” “मुझे अपना व्यवसाय बढ़ाना है।” “मुझे परीक्षा में सफल होना है।” “मुझे अपने रिश्ते को बेहतर बनाना है।” लेकिन केवल इच्छा कर लेना पर्याप्त नहीं है। हम चाहते हैं...