Friday, March 13, 2026

सच बोलने वाले सलाहकार ही बचाते हैं राज्य, शरीर और धर्म

 

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥

भावार्थः सचिव, वैद्य और गुरु—ये तीन यदि (अप्रसन्नता के) भय या (लाभ की) आशा से हित की बात न कहकर केवल प्रिय वचन बोलने लगें, तो क्रमशः राज्य, शरीर और धर्म—इन तीनों का शीघ्र ही नाश हो जाता है।

आज बात श्रीरामचरितमानस के एक अत्यंत महत्वपूर्ण दोहे की। गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित मानस के सुंदरकाण्ड में आया यह दोहा हमें एक गहरी प्रशासनिक, नैतिक और जीवन प्रबंधन की शिक्षा देता है। यह शिक्षा केवल शासन-प्रशासन तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे व्यक्तिगत, सामाजिक और पेशेवर जीवन—तीनों के लिए अत्यंत उपयोगी है।

यह दोहा हमें तीन महत्वपूर्ण व्यक्तियों के बारे में सावधान करता है—सचिव (सलाहकार), वैद्य (डॉक्टर) और गुरु (मार्गदर्शक)। तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि ये तीनों व्यक्ति भय या स्वार्थ के कारण सच्ची और हितकारी बात कहने से बचने लगें और केवल ठकुरसुहाती यानी सुनने में अच्छी लगने वाली बातें ही कहने लगें, तो इसके परिणाम अत्यंत घातक हो सकते हैं।

ऐसी स्थिति में राज्य का पतन, शरीर का रोग और धर्म का क्षय—ये तीनों बहुत जल्दी हो सकते हैं।

इस दोहे से हमें यह समझ में आता है कि जीवन में कुछ लोगों को सत्य बोलने की पूर्ण स्वतंत्रता देनी चाहिए। यदि हमारे आसपास केवल ऐसे लोग रह जाएँ जो हर समय हमारी प्रशंसा करें या हमें खुश करने के लिए ही बोलें, तो धीरे-धीरे हम वास्तविकता से दूर होते चले जाते हैं।

शासन और प्रशासन में इसका महत्व

शासन और प्रशासन के क्षेत्र में यह दोहा विशेष रूप से प्रासंगिक है। किसी भी शासक या प्रशासक के लिए उसके सलाहकारों और अधिकारियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि सलाहकार केवल वही बात कहें जो नेता को अच्छी लगे, तो गलत निर्णयों की संभावना बढ़ जाती है।

इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ शासकों के आसपास चापलूसों की भीड़ इकट्ठी हो गई और सच्ची सलाह देने वाले लोगों की उपेक्षा होने लगी। परिणामस्वरूप गलत नीतियाँ बनीं और अंततः शासन का पतन हुआ।

आधुनिक कॉर्पोरेट और पेशेवर जीवन में

आज के कॉर्पोरेट जगत में भी यह शिक्षा उतनी ही प्रासंगिक है। किसी भी संगठन में यदि वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थों को खुलकर सच बोलने का वातावरण नहीं देते, तो धीरे-धीरे संगठन में केवल “हाँ में हाँ मिलाने” की संस्कृति विकसित हो जाती है।

ऐसे माहौल में गलत नीतियाँ समय रहते सामने नहीं आ पातीं और संस्था को नुकसान उठाना पड़ता है। इसलिए आधुनिक प्रबंधन में आज ओपन फीडबैक, पारदर्शिता और ईमानदार सलाह को बहुत महत्व दिया जाता है।

स्वास्थ्य के संदर्भ में

दोहा में दूसरा महत्वपूर्ण व्यक्ति है वैद्य, अर्थात डॉक्टर। यदि डॉक्टर रोगी को प्रसन्न रखने के लिए वास्तविक स्थिति छिपा ले या उचित उपचार के बजाय केवल वही बताए जो रोगी सुनना चाहता है, तो रोग का सही उपचार संभव नहीं हो पाता।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में सत्य और स्पष्टता अत्यंत आवश्यक है। रोगी को उसकी स्थिति का सही ज्ञान होना चाहिए, तभी वह सही निर्णय ले सकता है।

आध्यात्मिक जीवन में गुरु का महत्व

तीसरा व्यक्ति है गुरु या मार्गदर्शक। गुरु का कार्य केवल शिष्य को प्रसन्न करना नहीं, बल्कि उसे सही मार्ग दिखाना होता है। कई बार यह मार्गदर्शन कठोर भी हो सकता है, लेकिन वही शिष्य के विकास के लिए आवश्यक होता है।

यदि गुरु भी केवल शिष्य को खुश करने के लिए ही बोलने लगे, तो आध्यात्मिक उन्नति असंभव हो जाती है।

आधुनिक समय के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र

आज के समय में यह दोहा हमें एक महत्वपूर्ण जीवन सूत्र देता है— अपने जीवन में ऐसे लोगों को स्थान दें जो आपको सच्चाई बता सकें, चाहे वह सुनने में थोड़ी कठिन ही क्यों न लगे।

सच्ची आलोचना और ईमानदार सलाह कभी-कभी असहज लग सकती है, लेकिन वही हमें गलतियों से बचाती है और सही दिशा में आगे बढ़ने में मदद करती है।

अंततः तुलसीदास जी का यह दोहा हमें यह याद दिलाता है कि चापलूसी से घिरे रहना किसी भी व्यक्ति, संस्था या शासन के लिए खतरनाक हो सकता है।

सच्चा मित्र, सच्चा सलाहकार, सच्चा चिकित्सक और सच्चा गुरु वही है जो हित की बात कहने का साहस रखता हो, चाहे वह बात क्षणिक रूप से अप्रिय ही क्यों न लगे।

इसलिए जीवन में ऐसे लोगों को महत्व देना चाहिए जो सत्य बोलने का साहस रखते हों, क्योंकि वही अंततः हमारे पद, स्वास्थ्य और धर्म—तीनों की रक्षा करते हैं।

Thursday, March 12, 2026

इस चौपाई में छिपी है सेवा और सुशासन की सीख

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।

सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥

भावार्थः जिसके राज्य में प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है॥


गोस्वामी तुलसीदासी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई अत्यंत प्रसिद्ध है। इसका संदेश जितना सरल और स्पष्ट है, उतना ही गहरा और व्यापक भी है। बालकाण्ड के प्रसंग में भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी को यह समझाते हुए सीख देते हैं कि जिस शासक के शासन में सामान्य जनता दुखी रहती है, वह शासक वास्तव में अपने पद के धर्म का पालन नहीं कर रहा होता और अंततः वह दंड का भागी बनता है।

यह चौपाई शासन की मूल भावना को अत्यंत संक्षेप में व्यक्त करती है- सत्ता का उद्देश्य सामान्य जन का सुख और कल्याण है।

पद का आकर्षण और उसका वास्तविक उद्देश्य

आज के समय में सत्ता के शीर्ष पदों को उनकी शक्ति, प्रतिष्ठा और सुविधाओं के कारण अत्यंत आकर्षक माना जाता है। जब भी कोई व्यक्ति ऐसे पद प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त करता है, तो अक्सर उसके पीछे कहीं न कहीं उस पद से जुड़ी शक्ति और सुविधाओं का आकर्षण भी छिपा होता है।

जबकि सच्चाई यह है कि पद चाहे छोटा हो या बड़ा, उसका मूल उद्देश्य सेवा ही होता है। जितना बड़ा पद, उतना ही बड़ा दायित्व और उतना ही व्यापक सेवा का अवसर।

आधुनिक युवाओं की आकांक्षाएँ

आज अनेक युवा शासन और प्रशासन के क्षेत्र में आने का सपना देखते हैं। विशेषकर सिविल सेवाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के मन में जिलाधिकारी जैसे पदों की एक आकर्षक छवि बन जाती है - शहर के प्रतिष्ठित इलाके में विशाल सरकारी बंगला, बाहर लगी चमकदार पीतल की नेमप्लेट, सफेद सरकारी गाड़ी, अर्दली, ड्राइवर और अन्य सहायक।

इस बाहरी चमक-दमक के कारण कई बार यह दिखाई नहीं देता कि इस पद के साथ कितनी बड़ी जिम्मेदारी जुड़ी हुई है। वास्तविकता यह है कि ऐसे पदों पर कार्य करने वाले अधिकारियों को अक्सर अत्यधिक कार्यभार, लगातार निर्णय लेने की जिम्मेदारी और अनेक प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ता है। कई बार वे इन सुविधाओं का आनंद लेने का समय भी नहीं निकाल पाते।

इसी प्रकार शासन के स्तर पर विधायक, सांसद, मेयर, मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पद भी युवाओं को आकर्षित करते हैं। परन्तु इन पदों की वास्तविक महत्ता को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम उनके मूल उद्देश्य को समझें-जनता की सेवा और समाज का कल्याण।

श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई शासन और प्रशासन के सभी उच्च पदों पर बैठे लोगों को एक स्पष्ट चेतावनी भी देती है और एक मार्गदर्शन भी। यह बताती है कि कोई भी पद केवल उसके प्रोटोकॉल, शक्ति या सुविधाओं का आनंद लेने के लिए नहीं है, बल्कि वह जनता की सेवा के लिए एक जिम्मेदारी है।

यदि किसी शासक के निर्णयों और नीतियों के कारण उसकी प्रजा दुखी होती है, तो वह शासन अपने उद्देश्य से भटक जाता है।

एक स्मरणीय सूत्र

इस दृष्टि से यह चौपाई केवल एक धार्मिक शिक्षा नहीं है, बल्कि सुशासन का सार्वकालिक सिद्धांत भी है। शासन और प्रशासन के उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए यह एक नैतिक स्मरण है कि उनका हर निर्णय जनता के हित को ध्यान में रखकर होना चाहिए

वास्तव में यदि इस चौपाई को शासन और प्रशासन से जुड़े लोग अपने कार्यालयों में ऐसी जगह लिखवा लें, जहाँ उनकी दृष्टि प्रतिदिन उस पर पड़े, तो यह उन्हें निरंतर उनके पद के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाती रहेगी।

क्योंकि अंततः किसी भी शासन या प्रशासन की सफलता का मापदंड यही है-क्या उसकी आम जनता सुखी है या नहीं।

आर्थिक प्रबंधन की सीख देती है मानस की यह चौपाई

सो धन धन्य प्रथम गति जाकी।
धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी॥

भावार्थ: वह धन धन्य है, जिसकी पहली गति होती है (जो दान देने में व्यय होता है) वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य में लगी हुई है। 

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई हमें आर्थिक प्रबंधन और सकारात्मक जीवन-दृष्टि की महत्वपूर्ण सीख देती है। उत्तरकाण्ड में वर्णित यह चौपाई बताती है कि धन का सर्वोत्तम उपयोग क्या है और उसे किस प्रकार जीवन में सार्थक बनाया जा सकता है।

भारतीय चिंतन में धन की तीन गतियाँ बताई गई हैं—दान, भोग और नाश। इनमें दान को सर्वोत्तम, भोग को मध्यम और नाश को निकृष्ट माना गया है। जो व्यक्ति न तो धन का दान करता है और न ही उसका उचित उपभोग करता है, उसके धन की अंततः तीसरी गति अर्थात् नाश ही होती है।

हम अक्सर सुनते हैं कि अत्यधिक संचय से बचना चाहिए। जितना आवश्यक हो उतना ही संचय करना उचित है। संचित धन का मूल्य समय के साथ धीरे-धीरे कम होता चला जाता है। इसी कारण आज अधिकांश लोग केवल धन को जमा करने की बजाय निवेश को प्राथमिकता देते हैं। बैंक की ब्याज दरें भी अब इतनी अधिक नहीं रहीं कि केवल बैंक में पैसा जमा कर देने से वह तेजी से बढ़ सके। कई वर्षों तक बैंक में पड़ा धन धीरे-धीरे अवमूल्यन का शिकार हो जाता है।

किन्तु गोस्वामी तुलसीदास जी इससे भी आगे की बात कहते हैं। वे बताते हैं कि धन का सर्वोत्तम उपयोग केवल संचय या निवेश नहीं, बल्कि परोपकार और दान में है। जब धन किसी के हित में लगाया जाता है, तब उसका प्रभाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सामाजिक भी होता है। ऐसे धन से मिलने वाला संतोष और सम्मान अदृश्य होते हुए भी अत्यन्त गहरा होता है। अनुभव यह भी बताता है कि जो व्यक्ति उदारतापूर्वक परोपकार में धन लगाता है, उसके जीवन में समृद्धि के मार्ग भी खुलते जाते हैं।

धन की दूसरी गति है उसका उपभोग। अक्सर देखा गया है—विशेषकर पिछली भारतीय पीढ़ियों में—कि लोग खर्च करने में अत्यधिक संकोच करते थे। वे अपने आवश्यक खर्चों से भी बचने का प्रयास करते थे और परिवार की छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए भी धन खर्च करना नहीं चाहते थे। उनका मुख्य उद्देश्य केवल धन का संचय करना होता था। परन्तु ऐसा भी उचित नहीं है। जब ईश्वर ने हमें हमारी आवश्यकताओं के अनुरूप साधन दिए हैं, तो उनका संतुलित और विवेकपूर्ण उपयोग करना भी आवश्यक है। यहाँ फिजूलखर्ची की बात नहीं कही जा रही, बल्कि आवश्यक और उचित खर्च की बात कही जा रही है।

धन की तीसरी और सबसे निकृष्ट गति है उसका नाश। प्रायः कहा जाता है कि कंजूस के धन की अंततः अधम गति होती है। वह धन या तो व्यर्थ नष्ट हो जाता है, या किसी विवाद, मुकदमे अथवा बीमारी में खर्च हो जाता है। इसलिए यदि धन को नाश की गति से बचाना है, तो उसे दान या उचित उपभोग की दिशा में लगाना ही श्रेयस्कर है।

इस चौपाई का एक और महत्वपूर्ण संदेश है—धन के साथ सही बुद्धि का होना भी आवश्यक है। यदि हमारे पास धन तो है, परंतु हमारी बुद्धि और दृष्टि सही नहीं है, तो वह धन हमें उन्नति की बजाय पतन की ओर भी ले जा सकता है। इसीलिए तुलसीदास जी कहते हैं कि वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्य कार्यों में लगी हुई है।

अर्थात् केवल धनवान होना पर्याप्त नहीं है; सद्बुद्धि और सदुपयोग ही धन को वास्तव में धन्य बनाते हैं।

Monday, March 2, 2026

बेहद कठिन होता है पद के मद से बच पाना

नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं।

प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥


भावार्थः इस संसार में ऐसा कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ है, जिसे प्रभुता-अर्थात् शक्ति, पद या अधिकार-पाकर मद (अहंकार) न हुआ हो।

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई जीवन की एक अत्यन्त यथार्थपूर्ण और कठोर सच्चाई को हमारे सामने रखती है। तुलसीदास जी यहाँ किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि मनुष्य-स्वभाव की बात कर रहे हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि प्रभुता मिलने पर मद का आना लगभग अनिवार्य है-इससे पूर्णतः बच पाना अत्यन्त कठिन है।

यहाँ मद का अर्थ केवल घमंड नहीं, बल्कि वह नशा है जो पद, शक्ति, धन, सौंदर्य, यौवन, बल या अधिकार से उत्पन्न होता है। जब व्यक्ति को यह अनुभव होने लगता है कि वह दूसरों से ऊपर है, उसके एक निर्णय से लोगों का जीवन प्रभावित होता है, तब अनजाने ही उसके भीतर ‘मैं’ का भाव गहराने लगता है।


इस चौपाई का संदर्भ उस प्रसंग से जुड़ा है, जब दक्ष प्रजापति अपने पद के मद में भगवान शिव की अवहेलना कर बैठते हैं। शिव जैसे महादेव को भी अपमानित करने का साहस पद के मद से ही उत्पन्न होता है। इस प्रसंग के माध्यम से तुलसीदास जी यह स्थापित कर देते हैं कि प्रभुता मिलने पर विवेक डगमगाने लगता है-चाहे वह कोई भी हो।

यदि आज के समय की बात करें, तो भारतीय व्यवस्था में दो क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ अत्यधिक शक्ति निहित है-शासन और प्रशासन। विधायक, सांसद या मंत्री जैसे शासकीय पद व्यक्ति को अपार अधिकार, यश और वैभव प्रदान करते हैं। उसी प्रकार प्रशासनिक सेवाओं में चयनित होकर बहुत कम आयु में किसी व्यक्ति को पूरे जिले या विभाग की कमान सौंप दी जाती है।

इन पदों के साथ अनेक सुविधाएँ भी स्वतः जुड़ जाती हैं-सरकारी वाहन, चालक, बंगला, सहायक, कर्मचारी, सुरक्षा, प्रोटोकॉल। व्यक्ति को अपनी कार का दरवाज़ा स्वयं खोलने की भी आवश्यकता नहीं रहती। समय, सुविधा और सम्मान-तीनों एक साथ मिलने लगते हैं। ऐसे वातावरण में अहंकार का प्रवेश होना स्वाभाविक है। उससे बच पाना सामान्य मनुष्य के लिए लगभग असंभव है; केवल अत्यन्त जागरूक साधक या विरल योगी ही इससे स्वयं को बचा पाते हैं।

समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति यह भूल जाता है कि पद स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी दायित्व है। अनेक बार एक अनुचित बयान, एक गलत निर्णय या एक हस्ताक्षर ही उस पद को छीन लेता है, जिस पर व्यक्ति फूल रहा था। सेवा-निवृत्ति के बाद कई अधिकारी स्वयं को अत्यन्त शक्तिहीन और उपेक्षित अनुभव करते हैं, क्योंकि कल तक जिनके एक संकेत पर काम होता था, आज वही लोग उन्हें पहचानने में संकोच करते हैं। यही कारण है कि अनेक लोग सेवानिवृत्ति के बाद भी किसी न किसी रूप में पद से जुड़े रहना चाहते हैं-क्योंकि पद का नशा सहजता से उतरता नहीं।

वास्तव में पद के साथ मिलने वाली शक्तियाँ और सुविधाएँ सेवा के लिए होती हैं, अहंकार के पोषण के लिए नहीं। वे इसलिए दी जाती हैं ताकि व्यक्ति अधिक समय और ऊर्जा लोकहित में लगा सके। परन्तु जब वही सुविधाएँ आपके अंदर के ‘मैं’ को बढ़ाने लगें, तो पद साधन न रहकर बाधा बन जाता है।

इसीलिए तुलसीदास जी ने अत्यन्त संक्षिप्त शब्दों में यह गहन सत्य कह दिया। यह चौपाई चेतावनी भी है और दर्पण भी-कि यदि हमें कभी प्रभुता मिले, तो स्वयं को निरन्तर यह स्मरण कराते रहें कि पद हमारा नहीं है, हमें सौंपा गया है, सेवा के लिए। 

पद और प्रभुता का मद आना स्वाभाविक है, पर उससे सावधान रहना ही सच्चे विवेक का प्रमाण है।

कुशल कार्य प्रबंधन सिखाती मानस की यह चौपाई

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा।
सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा॥

अर्थ: मुनीश्वर वशिष्ठ जी ने जिस व्यक्ति को जो कार्य करने की आज्ञा दी, उसने उस कार्य को इतनी तत्परता और दक्षता से पूर्ण किया, मानो वह कार्य पहले से ही करके रखा हो।

यह चौपाई श्रीरामचरितमानस के उस आदर्श कार्य-संस्कृति को उजागर करती है, जहाँ उद्देश्य स्पष्ट है, नेतृत्व सक्षम है और कार्य-वितरण सुव्यवस्थित है। भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी कोई साधारण आयोजन नहीं थी—वह सामाजिक, राजनैतिक और आध्यात्मिक तीनों स्तरों पर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समारोह था। इस विराट दायित्व का कुशल संचालन महर्षि वशिष्ठ के मार्गदर्शन में हुआ और प्रत्येक व्यक्ति ने अपने-अपने उत्तरदायित्व को पूर्ण निष्ठा, अनुशासन और गति के साथ निभाया।

यह चौपाई आधुनिक कार्य-प्रबंधन (Work Management) के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है। कोई भी कार्य तभी तीव्रता और गुणवत्ता के साथ सम्पन्न होता है, जब उसके लिए पूर्व-तैयारी की गई हो। जिस व्यक्ति को अपने दायित्व का स्पष्ट ज्ञान होता है और जिसने मानसिक तथा व्यावहारिक तैयारी पहले से कर रखी होती है, वह आदेश मिलते ही अव्यवस्था में नहीं उलझता—बल्कि सहजता और आत्मविश्वास के साथ कार्य पूर्ण करता है।

यह चौपाई हमें कार्यालय और व्यवसाय के दैनिक कार्यों के निष्पादन का एक महत्वपूर्ण सूत्र देती है। किसी भी कार्य को तीव्र गति से तभी पूरा किया जा सकता है, जब उसके सभी पहलुओं की समझ पहले से हो। आज अनेक कार्यालयों में वर्ष भर का कार्य-कैलेंडर पूर्व निर्धारित होता है—हमें पहले से ज्ञात होता है कि किस माह कौन-सा कार्य करना है। ऐसे में यदि हम उन कार्यों की तैयारी पहले से कर लें, तो अचानक आने वाले कार्यों के लिए हमारे पास समय और ऊर्जा दोनों सुरक्षित रहती हैं।

एक और महत्त्वपूर्ण बिंदु यहाँ ध्यान देने योग्य है—उत्साह। राज्याभिषेक से जुड़े सभी लोगों ने कार्य इसलिए भी तीव्रता से किए, क्योंकि उनके मन में प्रभु श्रीराम के राजतिलक को लेकर गहरा उल्लास और भावनात्मक जुड़ाव था। जहाँ उत्साह होता है, वहाँ गति स्वतः उत्पन्न होती है। यद्यपि यह सम्भव नहीं कि वर्ष भर समान उत्साह बना रहे, फिर भी स्वयं को प्रेरित रखना आवश्यक है। इसी कारण आधुनिक संस्थाएँ समय-समय पर कर्मचारियों के लिए गतिविधियाँ, यात्राएँ या छोटे आयोजन करती हैं—ताकि मन को विश्राम मिले और ऊर्जा पुनः संचित हो सके।

अतः आने वाले समय की बेहतर तैयारी के लिए मानस की इस चौपाई को स्मरण में रखें और अपने कार्यों को योजनाबद्ध ढंग से पूर्ण करें।

मानस का यह जीवन-सूत्र अत्यन्त सरल है—

स्पष्ट लक्ष्य + अग्रिम तैयारी + जीवंत उत्साह = कुशल कार्य-प्रबंधन।

यदि हम इस सूत्र को अपने कार्यजीवन में उतार लें, तो कोई भी दायित्व बोझ नहीं, बल्कि सफलता का अवसर बन जाता है।