Wednesday, February 11, 2026

मर्यादा का सूत्र: कहाँ जाना चाहिए और कहाँ नहीं

 

जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥

(यद्यपि इसमें संदेह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए भी जाना चाहिए, तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जाने से कल्याण नहीं होता।)

श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में आई यह चौपाई सामाजिक मर्यादा, आत्मसम्मान और विवेक का अत्यन्त सूक्ष्म सूत्र प्रस्तुत करती है। गोस्वामी तुलसीदास जी यहाँ केवल व्यवहार की बात नहीं करते, बल्कि जीवन की एक ऐसी परिस्थिति का समाधान देते हैं, जिससे लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी अवश्य गुजरता है।

इस चौपाई का प्रसंग भगवान शिव और माता सती से जुड़ा है। सती जी अपने पिता प्रजापति दक्ष के यहाँ आयोजित यज्ञ में जाना चाहती हैं, परन्तु शिव जी से वैर रखने के कारण दक्ष ने अपनी पुत्री को आमंत्रित नहीं किया था। तब भगवान शिव सती जी को समझाते हैं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाए जाना अनुचित नहीं माना जाता, क्योंकि वहाँ अधिकार और आत्मीयता का संबंध होता है। किन्तु वे यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि जहाँ विरोध, उपेक्षा या तिरस्कार की भावना हो, वहाँ जाना कल्याणकारी नहीं होता—चाहे वह स्थान कितना ही निकट या अपना क्यों न हो।

आगे की कथा सर्वविदित है। सती जी के आग्रह पर शिव जी उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति तो दे देते हैं, पर वहाँ उन्हें अपमान सहना पड़ता है। जब वे भगवान शिव का अपमान देखती हैं, तो उसे सहन नहीं कर पातीं और योगाग्नि में स्वयं को भस्म कर लेती हैं। यह प्रसंग केवल कथा नहीं, बल्कि विवेक की उपेक्षा का गम्भीर परिणाम है।

यह शिक्षा आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। आधुनिक जीवन में रिश्ते, कार्यस्थल, सामाजिक समारोह और पारिवारिक कार्यक्रम—इन सब में अक्सर यह दुविधा उत्पन्न होती है कि बिना आमंत्रण के जाना चाहिए या नहीं। कई बार मन करता है, पर मन के भीतर एक असहजता भी रहती है।

मानस हमें यहाँ भावनाओं के स्थान पर विवेक को प्राथमिकता देने की सीख देता है। जहाँ हमें केवल सहन किया जा रहा हो, जहाँ उपस्थिति से प्रसन्नता नहीं बल्कि असहजता पैदा हो, वहाँ जाना स्वयं के आत्मसम्मान और मानसिक शांति दोनों के लिए हानिकारक हो सकता है।

आज के युग में यह बात केवल पारिवारिक या सामाजिक संदर्भ तक सीमित नहीं है। कार्यस्थल पर, मित्रता में, यहाँ तक कि ऑनलाइन और सोशल स्पेस में भी यह सूत्र लागू होता है। जहाँ आपकी उपस्थिति का स्वागत न हो, वहाँ बार-बार जाने से न तो संबंध सुधरते हैं और न ही आत्मसम्मान बचता है।

इस चौपाई का सार यह नहीं है कि संबंध तोड़ दिए जाएँ, बल्कि यह है कि हर संबंध में मर्यादा और संतुलन बनाए रखा जाए। प्रेम, अपनत्व और अधिकार वहीं तक शोभा देते हैं, जहाँ उन्हें स्वीकार किया जाए।

शिव जी का यह उपदेश हमें सिखाता है—

  • जहाँ सम्मान न हो, वहाँ आग्रह न करें

  • जहाँ विरोध हो, वहाँ विवेक से दूरी रखें

  • और जहाँ स्वागत हो, वहीं संबंधों को पोषित करें

क्या हम अंदर से भी उतने सुंदर हैं, जितने बाहर से दिखते हैं?

 

मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसें॥

(यह मन का मैला और शरीर का कैसा सुंदर है, जैसे विष के रस से भरा हुआ सोने का घड़ा!)


श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में आई यह चौपाई केवल नैतिक उपदेश नहीं है, बल्कि मनुष्य के व्यक्तित्व को परखने की एक अत्यन्त सूक्ष्म कसौटी है। जिसका मन मैला हो, उसका शरीर कितना ही सुंदर क्यों न हो, वह किस काम का? वह तो उसी प्रकार है जैसे विष से भरा हुआ सोने का घड़ा—बाहर से अत्यन्त आकर्षक, भीतर से घातक।

आज के समय में यह चौपाई और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। आधुनिक समाज में व्यक्तित्व का मूल्यांकन अधिकतर बाहरी आडम्बरों से किया जाता है—सुंदर चेहरा, प्रभावशाली भाषा, ऊँचा पद, प्रसिद्धि और सोशल मीडिया पर बनाई गई छवि। परन्तु इन सबके पीछे मन की वास्तविक स्थिति क्या है, इसका अनुमान लगाना अत्यन्त कठिन हो गया है।

अनेक बार हम देखते हैं कि बाहर से अत्यन्त शालीन, सभ्य और सफल दिखने वाले लोग भीतर से ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और स्वार्थ से भरे होते हैं। बातचीत में भी आपने लोगों को कहते सुना होगा—“दिखने पर मत जाना, मन का बहुत काला है।” यह अनुभव जीवन में लगभग हर व्यक्ति ने कभी न कभी किया है।

कई बार बड़ी-बड़ी हस्तियाँ—सेलिब्रिटी, खिलाड़ी, नेता या समाज के आदर्श माने जाने वाले लोग—हमारे लिए प्रेरणा बन जाते हैं। पर जब उनके निजी जीवन की सच्चाइयाँ सामने आती हैं, तो मन टूट जाता है। तब समझ में आता है कि बाहरी चमक और आन्तरिक शुद्धता में कितना बड़ा अंतर हो सकता है।

तुलसीदास जी इस चौपाई के माध्यम से हमें चेतावनी ही नहीं, बल्कि दिशा भी देते हैं। वे कहते हैं कि जीवन को सुंदर बनाने के लिए केवल तन की नहीं, मन की साधना आवश्यक है। क्योंकि मन ही कर्मों का स्रोत है। यदि मन शुद्ध होगा, तो विचार शुद्ध होंगे; विचार शुद्ध होंगे, तो आचरण स्वतः ही सुंदर हो जाएगा।

सच्ची सुंदरता वह नहीं है जो आँखों को भाए, बल्कि वह है जो मन को शान्ति दे। सच्चा व्यक्तित्व वह नहीं जो मंच पर चमके, बल्कि वह है जो एकान्त में भी सच्चा बना रहे।

यह चौपाई हमें आत्मचिन्तन के लिए प्रेरित करती है—

  • क्या हमारी बाहरी सफलता के पीछे मन की पवित्रता भी है?

  • क्या हम जैसे दिखते हैं, वैसे ही भीतर से भी हैं?

  • कहीं हमारा व्यक्तित्व सोने के घड़े जैसा तो नहीं, जिसमें विष भरा हो?

यदि जीवन को वास्तव में श्रेष्ठ बनाना है, तो सबसे पहले मन को स्वच्छ बनाना होगा। क्योंकि सुंदर तन समय के साथ ढल जाता है, पर शुद्ध मन जीवन को अमर बना देता है।

स्थायी आय ही सच्चा आर्थिक प्रबंधन है

 

सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥

(जिन नदियों के मूल में कोई जलस्रोत नहीं है। (अर्थात जिन्हें केवल बरसात ही आसरा है) वे वर्षा बीत जाने पर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं॥)

श्रीरामचरितमानस के सुंदरकाण्ड में आई यह चौपाई पहली दृष्टि में प्रकृति का वर्णन प्रतीत होती है, पर वास्तव में यह आर्थिक प्रबंधन का एक अत्यन्त व्यावहारिक और कालजयी सूत्र देती है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जिन नदियों के मूल में कोई स्थायी जलस्रोत नहीं होता—जो केवल वर्षा पर निर्भर रहती हैं—वे बरसात समाप्त होते ही पुनः सूख जाती हैं।

यह बात केवल नदियों तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य के आर्थिक जीवन पर भी पूरी तरह लागू होती है। जिस व्यक्ति या परिवार के पास आय का स्थायी स्रोत नहीं होता, वह थोड़े समय की सम्पन्नता के बाद पुनः आर्थिक संकट में फँस जाता है।

आज के समय में आर्थिक चुनौतियाँ केवल आय की कमी से नहीं, बल्कि गलत वित्तीय आदतों से अधिक उत्पन्न हो रही हैं। अनेक लोग अपनी वास्तविक आय से अधिक खर्च करने लगते हैं। कभी किसी सम्पन्न रिश्तेदार पर निर्भर हो जाते हैं, कभी माता-पिता की बचत को आधार बना लेते हैं। कुछ लोग अस्थायी सुविधाओं के भरोसे जीवन-शैली खड़ी कर लेते हैं—जैसे बोनस, विरासत, एकमुश्त लाभ या बाहरी सहायता।

समस्या तब गम्भीर हो जाती है जब इच्छाओं की पूर्ति के लिए बैंक ऋण, पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड का अत्यधिक उपयोग होने लगता है। बिना यह सोचे कि यह धन स्थायी नहीं है, और एक दिन इसकी वापसी करनी ही होगी। जब वह “वर्षा” रुकती है, तब जीवन-रूपी नदी अचानक सूखने लगती है—तनाव, असुरक्षा और ऋण के बोझ के साथ।

मानस की यह चौपाई हमें स्पष्ट संकेत देती है कि आर्थिक स्थिरता का आधार अस्थायी आय नहीं, बल्कि सतत आय स्रोत होते हैं। जैसे नदी का जीवन उसके मूल स्रोत—झरने, हिमनद या भूमिगत जल—पर निर्भर करता है, वैसे ही व्यक्ति का आर्थिक जीवन उसके नियमित, भरोसेमंद और दीर्घकालिक आय-स्रोत पर टिका होता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि ऋण लेना या सहायता स्वीकार करना गलत है। समस्या तब होती है जब पूरा जीवन-प्रबंधन ही इन्हीं पर आधारित हो जाए। ऋण सहारा हो सकता है, आधार नहीं। बाहरी सहायता पुल हो सकती है, स्थायी भूमि नहीं।

सही आर्थिक प्रबंधन का मूल मंत्र है—

  • अपनी आय के भीतर रहकर खर्च करना

  • नियमित बचत की आदत डालना

  • आय के एक से अधिक स्थायी स्रोत विकसित करना

  • और भविष्य की अनिश्चितताओं के लिए तैयारी रखना

गोस्वामी तुलसीदास जी की यह चौपाई हमें यह भी सिखाती है कि आर्थिक समझ केवल गणित नहीं, विवेक का विषय है। जो व्यक्ति आज की चमक में बहकर कल की तैयारी नहीं करता, वह वर्षा के बाद सूखी नदी की तरह रह जाता है।

सफलता का भार वही उठा पाता है, जिसकी मर्यादा गहरी हो

छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥

छोटी नदियाँ भरकर (किनारों को) तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं (मर्यादा का त्याग कर देते हैं)।

श्रीरामचरितमानस के किष्किन्धा काण्ड में वर्षा ऋतु के वर्णन के प्रसंग में आई यह चौपाई केवल प्रकृति का चित्रण नहीं है, बल्कि मानव स्वभाव का अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि वर्षा के समय छोटी-छोटी नदियाँ जल से भरकर अपने ही किनारों को तोड़ती हुई बहने लगती हैं - ठीक उसी प्रकार जैसे थोड़े से धन या सफलता के मिलते ही दुष्ट प्रवृत्ति के लोग मर्यादा का त्याग कर बैठते हैं।

यह तुलना बहुत गहरी है। नदी छोटी हो या बड़ीकृपानी तो सबमें आता है। परन्तु फर्क यह है कि बड़ी और गहरी नदियाँ जल को अपने भीतर समेट लेती हैं, जबकि उथली नदियाँ उफनकर विनाश का कारण बन जाती हैं। यही स्थिति मनुष्य के जीवन में भी दिखाई देती है। सफलता, धन, पद या यश- ये सब “वर्षा” के समान हैं। पर यह वर्षा किसे समृद्ध करेगी और किसे विनाश की ओर ले जाएगी, यह व्यक्ति की आन्तरिक गहराई पर निर्भर करता है।

यह चौपाई हमें संकेत देती है कि सफलता को सँभाल पाना हर किसी के वश की बात नहीं होती। कई बार हम छोटी-छोटी उपलब्धियों से ही इतना फूल जाते हैं कि जीवन की दिशा ही भटक जाती है। व्यवहार में अकड़ आ जाती है, वाणी में कटुता आ जाती है और निर्णयों में विवेक का स्थान अहंकार ले लेता है। कुछ लोगों में व्यसन, विलास और भोग की प्रवृत्तियाँ भी इसी अवस्था में जन्म लेती हैं।

सबसे खतरनाक स्थिति तब आती है, जब ईश्वर की कृपा, परिस्थितियों का सहयोग और समाज का योगदानकृइन सबको भूलकर व्यक्ति अपनी सफलता को केवल अपना पुरुषार्थ मानने लगता है। यहीं से अहंकार जन्म लेता है। और अहंकार वही उफनती नदी है, जो सबसे पहले अपने ही तटों को तोड़ती है - अर्थात् अपने ही चरित्र, सम्बन्धों और मर्यादा को।

भारतीय दृष्टि में सफलता का मूल्यांकन उसके विस्तार से नहीं, उसके संयम से होता है। जो व्यक्ति जितना बड़ा होता है, उतना ही अधिक विनम्र होता है - यही सच्ची परिपक्वता है। गहराई का लक्षण शोर नहीं, स्थिरता है।

इस चौपाई से जीवन का एक स्पष्ट सूत्र निकलता है -

सफलता मिले तो स्वयं को बड़ा न समझो, अपने भीतर की मर्यादा को और गहरा करो।

क्योंकि जो व्यक्ति अपने अहंकार को नहीं बाँध पाता, वह अपनी ही सफलता का शिकार बन जाता है।