(जिन नदियों के मूल में कोई जलस्रोत नहीं है। (अर्थात जिन्हें केवल बरसात ही आसरा है) वे वर्षा बीत जाने पर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं॥)
श्रीरामचरितमानस के सुंदरकाण्ड में आई यह चौपाई पहली दृष्टि में प्रकृति का वर्णन प्रतीत होती है, पर वास्तव में यह आर्थिक प्रबंधन का एक अत्यन्त व्यावहारिक और कालजयी सूत्र देती है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जिन नदियों के मूल में कोई स्थायी जलस्रोत नहीं होता—जो केवल वर्षा पर निर्भर रहती हैं—वे बरसात समाप्त होते ही पुनः सूख जाती हैं।
यह बात केवल नदियों तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य के आर्थिक जीवन पर भी पूरी तरह लागू होती है। जिस व्यक्ति या परिवार के पास आय का स्थायी स्रोत नहीं होता, वह थोड़े समय की सम्पन्नता के बाद पुनः आर्थिक संकट में फँस जाता है।
आज के समय में आर्थिक चुनौतियाँ केवल आय की कमी से नहीं, बल्कि गलत वित्तीय आदतों से अधिक उत्पन्न हो रही हैं। अनेक लोग अपनी वास्तविक आय से अधिक खर्च करने लगते हैं। कभी किसी सम्पन्न रिश्तेदार पर निर्भर हो जाते हैं, कभी माता-पिता की बचत को आधार बना लेते हैं। कुछ लोग अस्थायी सुविधाओं के भरोसे जीवन-शैली खड़ी कर लेते हैं—जैसे बोनस, विरासत, एकमुश्त लाभ या बाहरी सहायता।
समस्या तब गम्भीर हो जाती है जब इच्छाओं की पूर्ति के लिए बैंक ऋण, पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड का अत्यधिक उपयोग होने लगता है। बिना यह सोचे कि यह धन स्थायी नहीं है, और एक दिन इसकी वापसी करनी ही होगी। जब वह “वर्षा” रुकती है, तब जीवन-रूपी नदी अचानक सूखने लगती है—तनाव, असुरक्षा और ऋण के बोझ के साथ।
मानस की यह चौपाई हमें स्पष्ट संकेत देती है कि आर्थिक स्थिरता का आधार अस्थायी आय नहीं, बल्कि सतत आय स्रोत होते हैं। जैसे नदी का जीवन उसके मूल स्रोत—झरने, हिमनद या भूमिगत जल—पर निर्भर करता है, वैसे ही व्यक्ति का आर्थिक जीवन उसके नियमित, भरोसेमंद और दीर्घकालिक आय-स्रोत पर टिका होता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि ऋण लेना या सहायता स्वीकार करना गलत है। समस्या तब होती है जब पूरा जीवन-प्रबंधन ही इन्हीं पर आधारित हो जाए। ऋण सहारा हो सकता है, आधार नहीं। बाहरी सहायता पुल हो सकती है, स्थायी भूमि नहीं।
सही आर्थिक प्रबंधन का मूल मंत्र है—
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अपनी आय के भीतर रहकर खर्च करना
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नियमित बचत की आदत डालना
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आय के एक से अधिक स्थायी स्रोत विकसित करना
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और भविष्य की अनिश्चितताओं के लिए तैयारी रखना
गोस्वामी तुलसीदास जी की यह चौपाई हमें यह भी सिखाती है कि आर्थिक समझ केवल गणित नहीं, विवेक का विषय है। जो व्यक्ति आज की चमक में बहकर कल की तैयारी नहीं करता, वह वर्षा के बाद सूखी नदी की तरह रह जाता है।
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