Wednesday, February 11, 2026

क्या हम अंदर से भी उतने सुंदर हैं, जितने बाहर से दिखते हैं?

 

मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसें॥

(यह मन का मैला और शरीर का कैसा सुंदर है, जैसे विष के रस से भरा हुआ सोने का घड़ा!)


श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में आई यह चौपाई केवल नैतिक उपदेश नहीं है, बल्कि मनुष्य के व्यक्तित्व को परखने की एक अत्यन्त सूक्ष्म कसौटी है। जिसका मन मैला हो, उसका शरीर कितना ही सुंदर क्यों न हो, वह किस काम का? वह तो उसी प्रकार है जैसे विष से भरा हुआ सोने का घड़ा—बाहर से अत्यन्त आकर्षक, भीतर से घातक।

आज के समय में यह चौपाई और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है। आधुनिक समाज में व्यक्तित्व का मूल्यांकन अधिकतर बाहरी आडम्बरों से किया जाता है—सुंदर चेहरा, प्रभावशाली भाषा, ऊँचा पद, प्रसिद्धि और सोशल मीडिया पर बनाई गई छवि। परन्तु इन सबके पीछे मन की वास्तविक स्थिति क्या है, इसका अनुमान लगाना अत्यन्त कठिन हो गया है।

अनेक बार हम देखते हैं कि बाहर से अत्यन्त शालीन, सभ्य और सफल दिखने वाले लोग भीतर से ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और स्वार्थ से भरे होते हैं। बातचीत में भी आपने लोगों को कहते सुना होगा—“दिखने पर मत जाना, मन का बहुत काला है।” यह अनुभव जीवन में लगभग हर व्यक्ति ने कभी न कभी किया है।

कई बार बड़ी-बड़ी हस्तियाँ—सेलिब्रिटी, खिलाड़ी, नेता या समाज के आदर्श माने जाने वाले लोग—हमारे लिए प्रेरणा बन जाते हैं। पर जब उनके निजी जीवन की सच्चाइयाँ सामने आती हैं, तो मन टूट जाता है। तब समझ में आता है कि बाहरी चमक और आन्तरिक शुद्धता में कितना बड़ा अंतर हो सकता है।

तुलसीदास जी इस चौपाई के माध्यम से हमें चेतावनी ही नहीं, बल्कि दिशा भी देते हैं। वे कहते हैं कि जीवन को सुंदर बनाने के लिए केवल तन की नहीं, मन की साधना आवश्यक है। क्योंकि मन ही कर्मों का स्रोत है। यदि मन शुद्ध होगा, तो विचार शुद्ध होंगे; विचार शुद्ध होंगे, तो आचरण स्वतः ही सुंदर हो जाएगा।

सच्ची सुंदरता वह नहीं है जो आँखों को भाए, बल्कि वह है जो मन को शान्ति दे। सच्चा व्यक्तित्व वह नहीं जो मंच पर चमके, बल्कि वह है जो एकान्त में भी सच्चा बना रहे।

यह चौपाई हमें आत्मचिन्तन के लिए प्रेरित करती है—

  • क्या हमारी बाहरी सफलता के पीछे मन की पवित्रता भी है?

  • क्या हम जैसे दिखते हैं, वैसे ही भीतर से भी हैं?

  • कहीं हमारा व्यक्तित्व सोने के घड़े जैसा तो नहीं, जिसमें विष भरा हो?

यदि जीवन को वास्तव में श्रेष्ठ बनाना है, तो सबसे पहले मन को स्वच्छ बनाना होगा। क्योंकि सुंदर तन समय के साथ ढल जाता है, पर शुद्ध मन जीवन को अमर बना देता है।

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