छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई॥
छोटी नदियाँ भरकर (किनारों को) तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं (मर्यादा का त्याग कर देते हैं)।
श्रीरामचरितमानस के किष्किन्धा काण्ड में वर्षा ऋतु के वर्णन के प्रसंग में आई यह चौपाई केवल प्रकृति का चित्रण नहीं है, बल्कि मानव स्वभाव का अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी है। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि वर्षा के समय छोटी-छोटी नदियाँ जल से भरकर अपने ही किनारों को तोड़ती हुई बहने लगती हैं - ठीक उसी प्रकार जैसे थोड़े से धन या सफलता के मिलते ही दुष्ट प्रवृत्ति के लोग मर्यादा का त्याग कर बैठते हैं।
यह तुलना बहुत गहरी है। नदी छोटी हो या बड़ीकृपानी तो सबमें आता है। परन्तु फर्क यह है कि बड़ी और गहरी नदियाँ जल को अपने भीतर समेट लेती हैं, जबकि उथली नदियाँ उफनकर विनाश का कारण बन जाती हैं। यही स्थिति मनुष्य के जीवन में भी दिखाई देती है। सफलता, धन, पद या यश- ये सब “वर्षा” के समान हैं। पर यह वर्षा किसे समृद्ध करेगी और किसे विनाश की ओर ले जाएगी, यह व्यक्ति की आन्तरिक गहराई पर निर्भर करता है।
यह चौपाई हमें संकेत देती है कि सफलता को सँभाल पाना हर किसी के वश की बात नहीं होती। कई बार हम छोटी-छोटी उपलब्धियों से ही इतना फूल जाते हैं कि जीवन की दिशा ही भटक जाती है। व्यवहार में अकड़ आ जाती है, वाणी में कटुता आ जाती है और निर्णयों में विवेक का स्थान अहंकार ले लेता है। कुछ लोगों में व्यसन, विलास और भोग की प्रवृत्तियाँ भी इसी अवस्था में जन्म लेती हैं।
सबसे खतरनाक स्थिति तब आती है, जब ईश्वर की कृपा, परिस्थितियों का सहयोग और समाज का योगदानकृइन सबको भूलकर व्यक्ति अपनी सफलता को केवल अपना पुरुषार्थ मानने लगता है। यहीं से अहंकार जन्म लेता है। और अहंकार वही उफनती नदी है, जो सबसे पहले अपने ही तटों को तोड़ती है - अर्थात् अपने ही चरित्र, सम्बन्धों और मर्यादा को।
भारतीय दृष्टि में सफलता का मूल्यांकन उसके विस्तार से नहीं, उसके संयम से होता है। जो व्यक्ति जितना बड़ा होता है, उतना ही अधिक विनम्र होता है - यही सच्ची परिपक्वता है। गहराई का लक्षण शोर नहीं, स्थिरता है।
इस चौपाई से जीवन का एक स्पष्ट सूत्र निकलता है -
सफलता मिले तो स्वयं को बड़ा न समझो, अपने भीतर की मर्यादा को और गहरा करो।
क्योंकि जो व्यक्ति अपने अहंकार को नहीं बाँध पाता, वह अपनी ही सफलता का शिकार बन जाता है।
No comments:
Post a Comment