Monday, March 2, 2026

बेहद कठिन होता है पद के मद से बच पाना

नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं।

प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥


भावार्थः इस संसार में ऐसा कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ है, जिसे प्रभुता-अर्थात् शक्ति, पद या अधिकार-पाकर मद (अहंकार) न हुआ हो।

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई जीवन की एक अत्यन्त यथार्थपूर्ण और कठोर सच्चाई को हमारे सामने रखती है। तुलसीदास जी यहाँ किसी व्यक्ति विशेष की नहीं, बल्कि मनुष्य-स्वभाव की बात कर रहे हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि प्रभुता मिलने पर मद का आना लगभग अनिवार्य है-इससे पूर्णतः बच पाना अत्यन्त कठिन है।

यहाँ मद का अर्थ केवल घमंड नहीं, बल्कि वह नशा है जो पद, शक्ति, धन, सौंदर्य, यौवन, बल या अधिकार से उत्पन्न होता है। जब व्यक्ति को यह अनुभव होने लगता है कि वह दूसरों से ऊपर है, उसके एक निर्णय से लोगों का जीवन प्रभावित होता है, तब अनजाने ही उसके भीतर ‘मैं’ का भाव गहराने लगता है।


इस चौपाई का संदर्भ उस प्रसंग से जुड़ा है, जब दक्ष प्रजापति अपने पद के मद में भगवान शिव की अवहेलना कर बैठते हैं। शिव जैसे महादेव को भी अपमानित करने का साहस पद के मद से ही उत्पन्न होता है। इस प्रसंग के माध्यम से तुलसीदास जी यह स्थापित कर देते हैं कि प्रभुता मिलने पर विवेक डगमगाने लगता है-चाहे वह कोई भी हो।

यदि आज के समय की बात करें, तो भारतीय व्यवस्था में दो क्षेत्र ऐसे हैं जहाँ अत्यधिक शक्ति निहित है-शासन और प्रशासन। विधायक, सांसद या मंत्री जैसे शासकीय पद व्यक्ति को अपार अधिकार, यश और वैभव प्रदान करते हैं। उसी प्रकार प्रशासनिक सेवाओं में चयनित होकर बहुत कम आयु में किसी व्यक्ति को पूरे जिले या विभाग की कमान सौंप दी जाती है।

इन पदों के साथ अनेक सुविधाएँ भी स्वतः जुड़ जाती हैं-सरकारी वाहन, चालक, बंगला, सहायक, कर्मचारी, सुरक्षा, प्रोटोकॉल। व्यक्ति को अपनी कार का दरवाज़ा स्वयं खोलने की भी आवश्यकता नहीं रहती। समय, सुविधा और सम्मान-तीनों एक साथ मिलने लगते हैं। ऐसे वातावरण में अहंकार का प्रवेश होना स्वाभाविक है। उससे बच पाना सामान्य मनुष्य के लिए लगभग असंभव है; केवल अत्यन्त जागरूक साधक या विरल योगी ही इससे स्वयं को बचा पाते हैं।

समस्या तब उत्पन्न होती है, जब व्यक्ति यह भूल जाता है कि पद स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी दायित्व है। अनेक बार एक अनुचित बयान, एक गलत निर्णय या एक हस्ताक्षर ही उस पद को छीन लेता है, जिस पर व्यक्ति फूल रहा था। सेवा-निवृत्ति के बाद कई अधिकारी स्वयं को अत्यन्त शक्तिहीन और उपेक्षित अनुभव करते हैं, क्योंकि कल तक जिनके एक संकेत पर काम होता था, आज वही लोग उन्हें पहचानने में संकोच करते हैं। यही कारण है कि अनेक लोग सेवानिवृत्ति के बाद भी किसी न किसी रूप में पद से जुड़े रहना चाहते हैं-क्योंकि पद का नशा सहजता से उतरता नहीं।

वास्तव में पद के साथ मिलने वाली शक्तियाँ और सुविधाएँ सेवा के लिए होती हैं, अहंकार के पोषण के लिए नहीं। वे इसलिए दी जाती हैं ताकि व्यक्ति अधिक समय और ऊर्जा लोकहित में लगा सके। परन्तु जब वही सुविधाएँ आपके अंदर के ‘मैं’ को बढ़ाने लगें, तो पद साधन न रहकर बाधा बन जाता है।

इसीलिए तुलसीदास जी ने अत्यन्त संक्षिप्त शब्दों में यह गहन सत्य कह दिया। यह चौपाई चेतावनी भी है और दर्पण भी-कि यदि हमें कभी प्रभुता मिले, तो स्वयं को निरन्तर यह स्मरण कराते रहें कि पद हमारा नहीं है, हमें सौंपा गया है, सेवा के लिए। 

पद और प्रभुता का मद आना स्वाभाविक है, पर उससे सावधान रहना ही सच्चे विवेक का प्रमाण है।

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