Thursday, March 12, 2026

इस चौपाई में छिपी है सेवा और सुशासन की सीख

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।

सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥

भावार्थः जिसके राज्य में प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है॥


गोस्वामी तुलसीदासी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई अत्यंत प्रसिद्ध है। इसका संदेश जितना सरल और स्पष्ट है, उतना ही गहरा और व्यापक भी है। बालकाण्ड के प्रसंग में भगवान श्रीराम अपने छोटे भाई लक्ष्मण जी को यह समझाते हुए सीख देते हैं कि जिस शासक के शासन में सामान्य जनता दुखी रहती है, वह शासक वास्तव में अपने पद के धर्म का पालन नहीं कर रहा होता और अंततः वह दंड का भागी बनता है।

यह चौपाई शासन की मूल भावना को अत्यंत संक्षेप में व्यक्त करती है- सत्ता का उद्देश्य सामान्य जन का सुख और कल्याण है।

पद का आकर्षण और उसका वास्तविक उद्देश्य

आज के समय में सत्ता के शीर्ष पदों को उनकी शक्ति, प्रतिष्ठा और सुविधाओं के कारण अत्यंत आकर्षक माना जाता है। जब भी कोई व्यक्ति ऐसे पद प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त करता है, तो अक्सर उसके पीछे कहीं न कहीं उस पद से जुड़ी शक्ति और सुविधाओं का आकर्षण भी छिपा होता है।

जबकि सच्चाई यह है कि पद चाहे छोटा हो या बड़ा, उसका मूल उद्देश्य सेवा ही होता है। जितना बड़ा पद, उतना ही बड़ा दायित्व और उतना ही व्यापक सेवा का अवसर।

आधुनिक युवाओं की आकांक्षाएँ

आज अनेक युवा शासन और प्रशासन के क्षेत्र में आने का सपना देखते हैं। विशेषकर सिविल सेवाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के मन में जिलाधिकारी जैसे पदों की एक आकर्षक छवि बन जाती है - शहर के प्रतिष्ठित इलाके में विशाल सरकारी बंगला, बाहर लगी चमकदार पीतल की नेमप्लेट, सफेद सरकारी गाड़ी, अर्दली, ड्राइवर और अन्य सहायक।

इस बाहरी चमक-दमक के कारण कई बार यह दिखाई नहीं देता कि इस पद के साथ कितनी बड़ी जिम्मेदारी जुड़ी हुई है। वास्तविकता यह है कि ऐसे पदों पर कार्य करने वाले अधिकारियों को अक्सर अत्यधिक कार्यभार, लगातार निर्णय लेने की जिम्मेदारी और अनेक प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ता है। कई बार वे इन सुविधाओं का आनंद लेने का समय भी नहीं निकाल पाते।

इसी प्रकार शासन के स्तर पर विधायक, सांसद, मेयर, मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पद भी युवाओं को आकर्षित करते हैं। परन्तु इन पदों की वास्तविक महत्ता को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम उनके मूल उद्देश्य को समझें-जनता की सेवा और समाज का कल्याण।

श्रीरामचरितमानस की यह चौपाई शासन और प्रशासन के सभी उच्च पदों पर बैठे लोगों को एक स्पष्ट चेतावनी भी देती है और एक मार्गदर्शन भी। यह बताती है कि कोई भी पद केवल उसके प्रोटोकॉल, शक्ति या सुविधाओं का आनंद लेने के लिए नहीं है, बल्कि वह जनता की सेवा के लिए एक जिम्मेदारी है।

यदि किसी शासक के निर्णयों और नीतियों के कारण उसकी प्रजा दुखी होती है, तो वह शासन अपने उद्देश्य से भटक जाता है।

एक स्मरणीय सूत्र

इस दृष्टि से यह चौपाई केवल एक धार्मिक शिक्षा नहीं है, बल्कि सुशासन का सार्वकालिक सिद्धांत भी है। शासन और प्रशासन के उच्च पदों पर बैठे लोगों के लिए यह एक नैतिक स्मरण है कि उनका हर निर्णय जनता के हित को ध्यान में रखकर होना चाहिए

वास्तव में यदि इस चौपाई को शासन और प्रशासन से जुड़े लोग अपने कार्यालयों में ऐसी जगह लिखवा लें, जहाँ उनकी दृष्टि प्रतिदिन उस पर पड़े, तो यह उन्हें निरंतर उनके पद के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाती रहेगी।

क्योंकि अंततः किसी भी शासन या प्रशासन की सफलता का मापदंड यही है-क्या उसकी आम जनता सुखी है या नहीं।

No comments:

Post a Comment